Dharmpal Saroj 10 Aug 2026 कहानियाँ देश-प्रेम 15 अगस्त के लिए इमोशनल स्टोरी, धरती माता के ऊपर लिखी हुई एक भावुक कहानी, देश भक्ति कहानी 2792 0 Hindi :: हिंदी
सुबह के पाँच बज रहे थे। गाँव की गलियों में अभी अँधेरा था, लेकिन रामदीन की आँखों में नींद नहीं थी। वह अपनी पुरानी चारपाई से उठा, आँगन में रखे मिट्टी के घड़े से पानी पिया और कमरे की दीवार पर टंगी एक पुरानी तस्वीर के सामने जाकर खड़ा हो गया। तस्वीर में एक जवान मुस्कुरा रहा था। उसकी वर्दी पर तिरंगा लगा था। नाम था—अर्जुन। रामदीन का इकलौता बेटा। हर साल 15 अगस्त को रामदीन सबसे पहले उसी तस्वीर के सामने दिया जलाता था। उस साल भी उसने तस्वीर साफ की और धीरे से बोला— “बेटा... आज फिर तेरा दिन है।” उसकी आवाज काँप गई। अर्जुन को गए हुए आठ साल हो चुके थे। लेकिन रामदीन के लिए वह आज भी घर के दरवाजे से आवाज लगाकर कहता था— “बाबूजी, खाना लग गया क्या?” रामदीन की आँखों के सामने अचानक आठ साल पुराना दिन घूम गया। अर्जुन सेना में भर्ती होने जा रहा था। उसकी माँ ने उसके लिए रोटियाँ बाँधी थीं। रामदीन ने बेटे के कंधे पर हाथ रखकर कहा था— “बेटा, नौकरी कोई भी करना... बस अपनी जान संभालकर रखना।” अर्जुन मुस्कुराया था। “बाबूजी, जान तो सबकी प्यारी होती है। लेकिन जिस मिट्टी ने हमें जन्म दिया है, उसके लिए कुछ करना भी तो जरूरी है।” रामदीन ने उसकी आँखों में देखा। “तू वापस आएगा न?” अर्जुन कुछ पल चुप रहा। फिर उसने पिता को गले लगा लिया। “वापस आने की पूरी कोशिश करूँगा बाबूजी... लेकिन अगर कभी देर हो जाए, तो समझ लेना कि मैं भारत माँ की गोद में सो गया।” रामदीन ने उसके मुँह पर हाथ रख दिया था। “ऐसी बात मत कर।” अर्जुन हँस पड़ा। “अरे बाबूजी, मैं तो मजाक कर रहा हूँ।” लेकिन वह मजाक कुछ वर्षों बाद सच हो गया। सीमा पर एक मुठभेड़ के दौरान अर्जुन ने अपने कई साथियों की जान बचाई। वह खुद वापस नहीं लौट पाया। जब सेना के अधिकारी अर्जुन का पार्थिव शरीर लेकर गाँव पहुँचे, तब पूरा गाँव तिरंगे में लिपटे उस बेटे को अंतिम विदाई देने के लिए उमड़ पड़ा था। रामदीन ने ताबूत पर हाथ रखा था। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन उसने किसी के सामने चीखकर अपना दुख नहीं दिखाया। बस इतना कहा था— “मेरा बेटा गया नहीं है... वह इस तिरंगे में जिंदा है।” उस दिन के बाद रामदीन हर 15 अगस्त को गाँव के स्कूल में होने वाले ध्वजारोहण में जरूर जाता था। इस बार भी वह तैयार होकर स्कूल पहुँचा। स्कूल के मैदान में बच्चे कतार में खड़े थे। प्रधानाचार्य ने बच्चों से कहा— “आज हमारे बीच रामदीन जी भी हैं। इनके बेटे अर्जुन ने देश की रक्षा करते हुए अपना जीवन बलिदान किया था।” पूरा मैदान तालियों से गूँज उठा। रामदीन ने हाथ जोड़ लिए। तभी एक छोटा बच्चा उसके पास आया। उसके हाथ में कागज का बना हुआ तिरंगा था। बच्चे ने पूछा— “दादाजी, आपके बेटे भी देश के लिए लड़ते थे?” रामदीन ने मुस्कुराकर कहा— “हाँ बेटा।” बच्चे ने फिर पूछा— “क्या उन्हें डर नहीं लगता था?” रामदीन कुछ क्षण चुप रहा। फिर बोला— “डर तो उन्हें भी लगता होगा बेटा... क्योंकि वह भी इंसान थे। लेकिन जब सामने देश होता है, तो इंसान अपने डर से बड़ा हो जाता है।” बच्चा चुपचाप रामदीन को देखने लगा। फिर उसने अपना कागज का तिरंगा रामदीन के हाथ में रख दिया। “दादाजी, ये आप रख लो।” रामदीन की आँखें भर आईं। उसने तिरंगे को अपने सीने से लगा लिया। ध्वजारोहण का समय हो गया। रस्सी खींची गई। तिरंगा आसमान में लहराने लगा। बच्चे जोर से बोले— “भारत माता की जय!” रामदीन की आँखें उस तिरंगे पर टिक गईं। उसे लगा जैसे अर्जुन कहीं दूर से मुस्कुराकर उसे देख रहा हो। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद रामदीन धीरे-धीरे घर की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसने देखा कि गाँव के कुछ बच्चे सड़क किनारे पड़े प्लास्टिक और कागज उठा रहे थे। रामदीन ने पूछा— “क्या कर रहे हो?” एक बच्चे ने कहा— “दादाजी, स्कूल में सर ने बताया कि देश से प्यार सिर्फ नारे लगाने से नहीं होता। इसलिए हम अपना गाँव साफ कर रहे हैं।” रामदीन कुछ पल उन्हें देखता रहा। उसके चेहरे पर पहली बार एक अलग तरह की खुशी दिखाई दी। वह बोला— “बस बेटा... यही तो असली देशभक्ति है।” घर पहुँचकर उसने अर्जुन की तस्वीर के सामने वही छोटा कागज का तिरंगा रख दिया। फिर तस्वीर से बोला— “अर्जुन... आज समझ आया कि तू सच में गया नहीं है।” उसने तस्वीर पर हाथ फेरा। “तू उन बच्चों की सोच में है... उन जवानों की वर्दी में है... खेत में मेहनत करते किसान के पसीने में है... और उस तिरंगे की हर लहर में है।” रामदीन की आँखों से आँसू निकल आए। लेकिन इस बार उन आँसुओं में केवल दुख नहीं था। उनमें गर्व भी था। बाहर आसमान में तिरंगा हवा के साथ लहरा रहा था। और रामदीन के घर के सामने से गुजरते हुए बच्चों की आवाज सुनाई दी— “सारे जहाँ से अच्छा...” रामदीन ने दरवाजा खोला। आसमान की ओर देखा और धीरे से कहा— “बेटा... तेरा वादा मैंने निभा दिया।” हवा चली। तिरंगा और ऊँचा लहराने लगा। शायद वह अर्जुन का जवाब था— “बाबूजी, आपने नहीं... पूरे देश ने मेरा वादा निभाया है।” उस दिन रामदीन को समझ आया कि देश के लिए मरने वाला एक जवान केवल अपने परिवार का बेटा नहीं होता। वह पूरे देश का बेटा होता है। और उसका तिरंगा... उसकी सबसे बड़ी पहचान। जय हिंद। 🇮🇳