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एक हॉरर डरावनी कहानी

Dharmpal Saroj 15 Aug 2026 कहानियाँ अन्य हॉरर स्टोरी 3600 0 Hindi :: हिंदी

काली पहाड़ी का आखिरी घर
उत्तराखंड की पहाड़ियों में एक छोटा-सा गाँव था—देवगढ़। गाँव इतना शांत था कि रात में हवा के चलने की आवाज भी साफ सुनाई देती थी। चारों तरफ देवदार के ऊँचे-ऊँचे पेड़, पहाड़ों पर फैली धुंध और दूर कहीं बहती नदी की धीमी आवाज इस जगह को सुंदर भी बनाती थी और रहस्यमयी भी।
लेकिन देवगढ़ की सबसे ऊँची पहाड़ी पर एक पुराना घर था।
लोग उसे काली कोठी कहते थे।
वह घर लगभग तीस साल से बंद पड़ा था।
गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि सूरज ढलने के बाद उस घर की तरफ नहीं जाना चाहिए।
क्यों?
इस सवाल का जवाब कोई साफ-साफ नहीं देता था।
बस इतना कहा जाता था—
“वहाँ रात में किसी के रोने की आवाज आती है।”
शहर में रहने वाला अमन इन बातों को अंधविश्वास समझता था।
अमन पेशे से लेखक था। उसे रहस्यमयी जगहों पर जाकर कहानियाँ लिखने का शौक था। एक दिन उसे पता चला कि उसके दादा का पुराना घर देवगढ़ में ही था और कई वर्षों से बंद पड़ा था।
उसने फैसला किया कि वह कुछ दिनों के लिए गाँव जाएगा।
शायद वहाँ उसे अपनी अगली कहानी के लिए कोई अच्छा विषय मिल जाए।
अमन शाम करीब पाँच बजे देवगढ़ पहुँचा।
बस गाँव के नीचे वाले मोड़ तक ही जाती थी। वहाँ से उसे लगभग दो किलोमीटर पैदल चलना पड़ा।
रास्ते में उसकी मुलाकात एक बूढ़े आदमी से हुई।
“बाबू, कहाँ जाना है?” बूढ़े ने पूछा।
“अपने दादा के घर।”
“किसका घर?”
अमन ने नाम बताया।
बूढ़े का चेहरा अचानक बदल गया।
“तुम... हरिनारायण जी के पोते हो?”
“जी।”
बूढ़ा कुछ देर उसे देखता रहा।
फिर धीमी आवाज में बोला—
“तुम्हें रात होने से पहले घर पहुँच जाना चाहिए।”
अमन हँस पड़ा।
“क्यों? यहाँ भालू हैं क्या?”
बूढ़े ने सिर हिलाया।
“भालू से भी ज्यादा खतरनाक चीज है।”
अमन ने पूछा, “क्या?”
बूढ़े ने पहाड़ी की तरफ देखा।
“काली कोठी।”
अमन ने देखा कि बूढ़े की नजर पहाड़ी के उस पुराने घर पर थी।
“वह घर मेरे दादा का है।”
बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया।
बस अपना रास्ता पकड़ लिया।
अमन अपने दादा के घर पहुँचा।
घर पुराना जरूर था, लेकिन रहने लायक था। उसने खिड़कियाँ खोलीं, धूल साफ की और अपना सामान रख दिया।
शाम तक बारिश शुरू हो गई।
पहाड़ों में बारिश अचानक आती है।
कुछ ही मिनटों में पूरा आसमान काले बादलों से ढक गया।
अमन ने खाना बनाया और फिर अपनी नोटबुक लेकर खिड़की के पास बैठ गया।
उसने बाहर देखा।
बारिश के बीच दूर पहाड़ी पर काली कोठी दिखाई दे रही थी।
अचानक बिजली चमकी।
एक पल के लिए पूरा पहाड़ रोशनी से भर गया।
और उसी रोशनी में अमन ने देखा—
काली कोठी की ऊपरी खिड़की में कोई खड़ा था।
एक लड़की।
सफेद कपड़ों में।
अमन कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।
फिर अंधेरा छा गया।
“शायद पेड़ की परछाईं होगी।”
उसने खुद से कहा।
लेकिन उसके मन में एक अजीब बेचैनी पैदा हो गई।
रात करीब ग्यारह बजे अमन सोने चला गया।
लगभग दो बजे उसकी नींद खुली।
ठक... ठक... ठक...
दरवाजे पर दस्तक हो रही थी।
अमन कुछ देर चुपचाप सुनता रहा।
फिर दस्तक दोबारा हुई।
ठक... ठक... ठक...
“कौन है?”
कोई जवाब नहीं आया।
अमन ने दरवाजा नहीं खोला।
कुछ मिनट बाद आवाज बंद हो गई।
सुबह उसने दरवाजा खोला।
बाहर कोई नहीं था।
लेकिन दरवाजे के सामने गीली मिट्टी पर पैरों के निशान थे।
वे निशान घर से बाहर की तरफ नहीं जा रहे थे।
वे निशान...
घर के अंदर की तरफ आ रहे थे।
अमन का चेहरा पीला पड़ गया।
उस दिन अमन गाँव में गया।
वही बूढ़ा आदमी उसे चाय की दुकान पर मिल गया।
अमन ने रात की घटना बताई।
बूढ़े ने चुपचाप चाय का गिलास नीचे रख दिया।
“मैंने कहा था, रात में सावधान रहना।”
“लेकिन मेरे घर में कोई आया कैसे?”
बूढ़े ने पूछा—
“क्या रात में किसी ने तुम्हारा नाम लेकर पुकारा?”
अमन चौंक गया।
“नहीं।”
बूढ़े ने राहत की साँस ली।
“अच्छा है।”
“अगर किसी रात कोई तुम्हें बाहर से नाम लेकर बुलाए... तो जवाब मत देना।”
अमन ने पूछा, “क्यों?”
बूढ़े ने कहा—
“क्योंकि वह इंसान नहीं होगा।”
अमन को अब इस बात में दिलचस्पी होने लगी थी।
उसने गाँव के पुराने लोगों से काली कोठी के बारे में पूछना शुरू किया।
आखिरकार उसे पता चला कि लगभग तीस साल पहले वहाँ माया नाम की एक लड़की रहती थी।
माया बहुत शांत स्वभाव की थी।
उसके पिता गाँव के वैद्य थे।
एक रात माया अचानक गायब हो गई।
लोगों ने बहुत खोजा, लेकिन वह नहीं मिली।
कुछ दिनों बाद काली कोठी बंद कर दी गई।
उसके बाद गाँव में अजीब घटनाएँ होने लगीं।
रात में किसी लड़की के रोने की आवाज।
घर की खिड़कियों में दिखाई देती सफेद परछाईं।
और सबसे डरावनी बात—
जो व्यक्ति रात में काली कोठी के पास गया, उसने अगले दिन दावा किया कि किसी ने उसे उसके नाम से पुकारा था।
अमन ने पूछा—
“फिर क्या हुआ?”
बूढ़े ने कहा—
“जो लोग जवाब देते थे... वे वापस नहीं आते थे।”
उस रात अमन ने फैसला किया कि वह काली कोठी के पास जाएगा।
वह जानना चाहता था कि वहाँ वास्तव में क्या है।
रात के करीब दस बजे उसने टॉर्च उठाई और घर से निकल पड़ा।
बारिश बंद हो चुकी थी।
पहाड़ पर धुंध छाई हुई थी।
जैसे-जैसे वह काली कोठी के करीब पहुँचा, हवा ठंडी होती गई।
घर का दरवाजा आधा खुला था।
अमन ने टॉर्च अंदर डाली।
धूल से भरा कमरा।
पुरानी कुर्सियाँ।
टूटी हुई तस्वीरें।
और दीवार पर एक बड़ी-सी घड़ी।
घड़ी बंद थी।
लेकिन उसकी सुइयाँ एक ही समय पर रुकी थीं—
2 बजकर 17 मिनट।
अमन ने अपनी घड़ी देखी।
रात के 10 बजकर 14 मिनट थे।
अचानक पीछे से आवाज आई—
“अमन...”
उसका शरीर जैसे जम गया।
आवाज बिल्कुल साफ थी।
किसी लड़की की आवाज।
“अमन...”
उसने पीछे मुड़ने की कोशिश की।
लेकिन तभी उसे बूढ़े की बात याद आई—
“जवाब मत देना।”
अमन चुप रहा।
कुछ सेकंड बाद आवाज फिर आई।
इस बार बहुत पास से—
“अमन... मुझे पता है तुम यहाँ हो।”
अमन ने टॉर्च चारों तरफ घुमाई।
कोई नहीं था।
वह घर के अंदर आगे बढ़ा।
एक कमरे में उसे पुरानी डायरी मिली।
डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—
“माया की डायरी।”
अमन ने तेजी से पन्ने पलटने शुरू किए।
पहले कुछ पन्नों में सामान्य बातें थीं।
फिर अचानक एक जगह लिखा था—
“आज रात फिर किसी ने दरवाजा खटखटाया।”
अगले पन्ने पर—
“वह मेरे पिता की आवाज में मुझे बुला रहा था।”
फिर—
“मैंने दरवाजा नहीं खोला।”
अमन की धड़कन तेज हो गई।
अगला पन्ना आधा फटा हुआ था।
उस पर केवल एक वाक्य बचा था—
“अगर मैं गायब हो जाऊँ तो काली कोठी के नीचे वाले कमरे को मत खोलना।”
अमन ने डायरी बंद कर दी।
लेकिन तभी फर्श के नीचे से आवाज आई।
ठक... ठक... ठक...
अमन ने नीचे देखा।
लकड़ी के फर्श के एक हिस्से पर लोहे की अंगूठी लगी थी।
उसने उसे उठाया।
नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ थीं।
अमन को अब डर लगने लगा था।
लेकिन उसकी जिज्ञासा उससे ज्यादा मजबूत थी।
वह धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतरा।
नीचे एक छोटा कमरा था।
कमरे की दीवार पर दर्जनों नाम लिखे हुए थे।
कुछ पुराने।
कुछ नए।
और सबसे नीचे...
एक नाम अभी-अभी लिखा हुआ था।
अमन।
उसके हाथ से टॉर्च गिर गई।
अंधेरे में किसी के चलने की आवाज आई।
धीरे...
धीरे...
फिर एक लड़की की आवाज सुनाई दी—
“तुम बहुत देर से आए।”
अमन ने टॉर्च उठाई।
कमरे के दूसरे कोने में एक लड़की खड़ी थी।
सफेद कपड़े।
लंबे बाल।
चेहरा धुंधला।
अमन पीछे हट गया।
“तुम... माया हो?”
लड़की ने सिर उठाया।
“हाँ।”
“तुम यहाँ क्यों हो?”
कुछ पल खामोशी रही।
फिर माया ने कहा—
“मैं यहाँ नहीं हूँ।”
अमन समझ नहीं पाया।
“क्या मतलब?”
माया ने दीवार की तरफ इशारा किया।
“मैं भी कभी तुम्हारी तरह यहाँ आई थी।”
अमन ने पूछा—
“फिर?”
माया की आवाज काँपने लगी।
“इस घर में कोई और रहता है।”
“कौन?”
माया ने जवाब नहीं दिया।
उसने केवल कहा—
“जब वह तुम्हारी आवाज में तुम्हें पुकारे... तो पीछे मत देखना।”
उसी समय पीछे से अमन की अपनी ही आवाज आई—
“माया?”
अमन का दिल बैठ गया।
उसने माया की तरफ देखा।
माया गायब थी।
अंधेरे में फिर उसकी अपनी आवाज गूँजी—
“अमन... पीछे देखो।”
अमन ने आँखें बंद कर लीं।
“अमन...”
आवाज अब बिल्कुल उसके कान के पास थी।
फिर किसी ने उसके कंधे को छूने की कोशिश की।
अमन ने आँखें नहीं खोलीं।
कुछ देर बाद सब शांत हो गया।
जब उसने आँखें खोलीं, तो सामने एक पुराना आईना था।
आईने में अमन दिखाई दे रहा था।
लेकिन उसके पीछे...
एक लड़की खड़ी थी।
अमन ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।
कोई नहीं।
वह फिर आईने की तरफ मुड़ा।
अब आईने में लड़की नहीं थी।
बल्कि...
अमन भी नहीं था।
आईने में खाली कमरा दिखाई दे रहा था।
अमन घबराकर सीढ़ियों की तरफ भागा।
वह घर से बाहर निकलकर सीधे गाँव पहुँचा।
सुबह होने तक उसने किसी से कुछ नहीं कहा।
लेकिन गाँव के बूढ़े ने उसे देखते ही समझ लिया।
“तुमने नीचे का कमरा खोल दिया?”
अमन ने सिर हिला दिया।
बूढ़े ने आँखें बंद कर लीं।
“अब वह तुम्हारे साथ आ गई है।”
“कौन?”
बूढ़े ने कहा—
“जिसे तुमने आईने में देखा।”
अमन ने काँपती आवाज में पूछा—
“माया?”
बूढ़े ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“तो कौन?”
बूढ़े ने जवाब दिया—
“वह चीज जो माया की आवाज में लोगों को बुलाती है।”
अमन उसी दिन गाँव छोड़ने लगा।
बस आने में अभी एक घंटा था।
वह सड़क किनारे बैठा था।
तभी उसके फोन पर एक संदेश आया।
“तुम मुझे छोड़कर कहाँ जा रहे हो?”
अमन ने नंबर देखा।
कोई नंबर नहीं था।
केवल लिखा था—
UNKNOWN
उसने फोन बंद कर दिया।
कुछ सेकंड बाद फोन फिर बजा।
इस बार एक फोटो आई।
फोटो में वही काली कोठी थी।
लेकिन फोटो के अंदर खिड़की पर कोई खड़ा था।
अमन ने फोटो को ज़ूम किया।
वह खुद था।
वही कपड़े।
वही चेहरा।
वही जगह।
लेकिन फोटो में जो अमन खड़ा था...
वह मुस्कुरा रहा था।
बस आ गई।
अमन जल्दी से बस में बैठ गया।
बस पहाड़ी रास्ते से नीचे उतरने लगी।
कुछ देर बाद उसे राहत महसूस हुई।
उसने खिड़की से बाहर देखा।
देवगढ़ पीछे छूट रहा था।
लेकिन अचानक उसे सड़क के किनारे एक लड़की दिखाई दी।
सफेद कपड़े।
लंबे बाल।
वह बस को देख रही थी।
अमन ने आँखें बंद कर लीं।
कुछ सेकंड बाद उसने फिर देखा।
लड़की गायब थी।
उसने राहत की साँस ली।
लेकिन तभी बस की आखिरी सीट से आवाज आई—
“अमन...”
वही आवाज।
वही धीमी फुसफुसाहट।
अमन धीरे-धीरे पीछे देखने लगा।
लेकिन इस बार उसने खुद को रोक लिया।
उसने आँखें बंद कर लीं।
बस चलती रही।
कई महीने बीत गए।
अमन शहर वापस आ गया।
उसने काली कोठी के बारे में किसी से बात नहीं की।
उसने लिखना भी बंद कर दिया।
एक रात वह अपने कमरे में बैठा था।
घड़ी में 2 बजकर 17 मिनट हुए।
अचानक उसके कमरे की लाइट बंद हो गई।
फोन की स्क्रीन अपने आप जल उठी।
एक नया संदेश आया।
“तुमने मेरी कहानी पूरी नहीं की।”
अमन के हाथ काँपने लगे।
फिर दूसरा संदेश आया—
“अब आखिरी हिस्सा तुम लिखोगे।”
अमन ने फोन फेंक दिया।
लेकिन कुछ ही सेकंड बाद लैपटॉप अपने आप चालू हो गया।
स्क्रीन पर एक खाली दस्तावेज खुला।
और उसमें अक्षर अपने आप टाइप होने लगे—
“उत्तराखंड के एक छोटे से गाँव में एक लेखक रहता था...”
अमन कुर्सी से उठना चाहता था।
लेकिन उसके पैर जैसे जमीन से चिपक गए थे।
स्क्रीन पर अगली पंक्ति लिखी गई—
“उसका नाम अमन था।”
फिर तीसरी पंक्ति—
“एक रात वह काली कोठी गया।”
अमन की आँखों से आँसू निकल आए।
वह स्क्रीन बंद करने के लिए आगे बढ़ा।
तभी आखिरी पंक्ति दिखाई दी—
“और अब वह अकेला नहीं है।”
कमरे के पीछे से किसी लड़की की आवाज आई—
“अमन...”
उसने आँखें बंद कर लीं।
लेकिन इस बार आवाज के साथ एक और आवाज भी थी।
बहुत धीमी।
बहुत करीब।
“पीछे देखो...”
और उसी पल कमरे की घड़ी रुक गई।
2 बजकर 17 मिनट।
हमेशा के लिए।

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