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मां की आखिरी चिट्ठी

Dharmpal Saroj 07 Aug 2026 कहानियाँ समाजिक 1410 0 Hindi :: हिंदी

बरसात की हल्की-हल्की फुहारें गाँव की कच्ची गलियों को भिगो रही थीं। मिट्टी की भीनी खुशबू पूरे वातावरण में फैल गई थी। उसी गाँव के आख़िरी छोर पर एक छोटा-सा टूटा हुआ घर था। उस घर में रहती थीं सरस्वती देवी और उनका इकलौता बेटा अर्जुन।
सरस्वती देवी ने अपने जीवन में बहुत दुःख देखे थे। अर्जुन जब केवल पाँच साल का था, तभी उसके पिता का बीमारी से निधन हो गया। उस दिन के बाद सरस्वती ने आँसू पोंछे और अपने बेटे के भविष्य को ही अपनी दुनिया बना लिया।
दिन में वह खेतों में मजदूरी करतीं और रात को गाँव वालों के कपड़े सिलतीं। कई बार ऐसा होता कि घर में केवल एक रोटी होती। वह मुस्कुराकर अर्जुन से कहतीं, "बेटा, मुझे भूख नहीं है, तू खा ले।" लेकिन अर्जुन नहीं जानता था कि उसकी माँ तीन-तीन दिन आधा पेट खाकर रहती थी।
समय बीतता गया। अर्जुन पढ़ाई में बहुत तेज़ निकला। गाँव के मास्टरजी अक्सर कहते, "सरस्वती, तुम्हारा बेटा एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा।"
यह सुनकर सरस्वती की आँखों में चमक आ जाती। उन्हें लगता कि उनकी सारी मेहनत सफल हो जाएगी।
बारहवीं की परीक्षा में अर्जुन ने पूरे जिले में पहला स्थान प्राप्त किया। गाँव में मिठाइयाँ बँटीं। लेकिन खुशी के साथ एक चिंता भी थी—आगे की पढ़ाई के लिए पैसे कहाँ से आएँगे?
सरस्वती ने बिना किसी को बताए अपने पति की आख़िरी निशानी, चाँदी की पायल, बेच दी। उन्हीं पैसों से अर्जुन का शहर के कॉलेज में दाखिला कराया।
कॉलेज जाने वाले दिन सरस्वती ने उसके हाथ में एक छोटा-सा कपड़े का थैला दिया। उसमें कुछ सूखी रोटियाँ, गुड़ का एक टुकड़ा और एक पुरानी डायरी थी।
उन्होंने कहा, "बेटा, जब कभी अकेलापन लगे तो इस डायरी का आख़िरी पन्ना पढ़ लेना।"
अर्जुन ने मुस्कुराकर थैला रख लिया, लेकिन उसने डायरी कभी नहीं खोली।
शहर पहुँचकर अर्जुन की दुनिया बदल गई। नए दोस्त, नई नौकरी के सपने और बड़ी-बड़ी इमारतें... धीरे-धीरे गाँव और माँ के फोन उसे बोझ लगने लगे।
सरस्वती रोज़ शाम को दरवाज़े पर बैठकर बेटे के फोन का इंतज़ार करतीं। कई बार घंटों तक मोबाइल हाथ में रहता, लेकिन घंटी नहीं बजती।
जब कभी अर्जुन बात करता भी, तो जल्दी में कह देता, "माँ, अभी मीटिंग है... बाद में बात करता हूँ।"
सरस्वती हर बार मुस्कुराकर कहतीं, "ठीक है बेटा, अपना ध्यान रखना।"
उन्होंने कभी शिकायत नहीं की।
कुछ वर्षों बाद अर्जुन की अच्छी नौकरी लग गई। उसने शहर में अपना घर खरीद लिया। अब उसके पास सब कुछ था—पैसा, गाड़ी और सम्मान। लेकिन उस व्यस्त जीवन में माँ के लिए समय नहीं था।
एक दिन गाँव के पड़ोसी का फोन आया।
"अर्जुन... जल्दी आ जाओ... तुम्हारी माँ की तबीयत बहुत खराब है।"
अर्जुन उसी शाम गाँव पहुँचा। लेकिन इस बार माँ दरवाज़े पर उसका इंतज़ार नहीं कर रही थीं।
घर के अंदर सफेद चादर बिछी थी।
सरस्वती देवी हमेशा के लिए जा चुकी थीं।
अर्जुन फूट-फूटकर रो पड़ा। उसे पहली बार एहसास हुआ कि दुनिया की सबसे कीमती दौलत उसने खो दी है।
अंतिम संस्कार के बाद घर की सफाई करते समय उसे वही पुरानी डायरी मिली।
काँपते हाथों से उसने आख़िरी पन्ना खोला।
उस पर माँ की लिखावट थी—
"मेरे प्यारे अर्जुन, अगर तू यह पन्ना पढ़ रहा है, तो शायद मैं तेरे पास नहीं हूँ। मुझे तुझसे कभी कोई शिकायत नहीं रही। माँ का प्यार हिसाब नहीं रखता। बस एक बात याद रखना—ज़िंदगी में कितना भी बड़ा आदमी बन जाना, लेकिन किसी बूढ़ी माँ की आँखों में अपने बेटे का इंतज़ार कभी मत छोड़ना। जिस दिन तू किसी रोती हुई माँ के चेहरे पर मुस्कान ला देगा, समझना मैं फिर से जी उठूँगी।"
डायरी के पन्ने आँसुओं से भीग गए।
अर्जुन ने उसी दिन फैसला किया कि वह अपनी माँ का सपना दूसरों के जीवन में पूरा करेगा।
उसने अपने गाँव में "सरस्वती आश्रय" नाम से एक केंद्र शुरू किया, जहाँ अकेली और बेसहारा माताओं की देखभाल होने लगी। वह हर रविवार वहाँ जाकर उनके साथ खाना खाता, बातें करता और उनकी ज़रूरतें पूरी करता।
धीरे-धीरे उस छोटे से केंद्र की चर्चा दूर-दूर तक फैल गई। लोग दान देने लगे, युवा स्वयंसेवक जुड़ने लगे और कई बुज़ुर्ग माताओं को नया परिवार मिल गया।
हर साल अपनी माँ की पुण्यतिथि पर अर्जुन उसी पुराने घर के आँगन में बैठकर डायरी का आख़िरी पन्ना पढ़ता। उसे लगता जैसे हवा के साथ माँ की आवाज़ फिर सुनाई दे रही हो—
"बेटा, इंसान की सबसे बड़ी कमाई पैसा नहीं, बल्कि किसी की दुआ होती है।"
उस दिन अर्जुन की आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार उन आँसुओं में पछतावे से ज़्यादा कृतज्ञता थी।
गाँव के बच्चे जब उस आश्रय में आते, तो उन्हें एक बात ज़रूर सिखाई जाती—
"माँ के रहते उसकी कद्र करना सीखो, क्योंकि समय लौटकर नहीं आता।"
यही संदेश धीरे-धीरे पूरे इलाके में फैल गया।
और सरस्वती देवी, जो कभी एक साधारण मजदूर माँ थीं, अपने बेटे के अच्छे कर्मों के कारण लोगों के दिलों में हमेशा के लिए अमर हो गईं।

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