Dharmpal Saroj 17 Aug 2026 कहानियाँ प्यार-महोब्बत लव प्रेम की मौसम कहानीलव प्रेम की मौसम कहानी 244 0 Hindi :: हिंदी
बारिश उस रात कुछ ज्यादा ही तेज थी। शहर की सड़कें पानी से भर चुकी थीं और अस्पताल की खिड़कियों पर बारिश की बूंदें लगातार दस्तक दे रही थीं। बारह साल का सोनू अस्पताल के गलियारे में अकेला बैठा था। उसके हाथ में एक पुरानी घड़ी थी, जिसे वह बार-बार देख रहा था। घड़ी की सुइयाँ रात के दस बजा रही थीं। सोनू की नजर बार-बार अस्पताल के उस दरवाजे पर जा रही थी, जिसके पीछे उसके पिता भर्ती थे। कुछ घंटे पहले डॉक्टर ने कहा था— “ऑपरेशन जरूरी है। आप लोग हिम्मत रखिए।” लेकिन सोनू की माँ इस दुनिया में नहीं थी। तीन साल पहले एक बीमारी ने उसे उससे छीन लिया था। तब से सोनू और उसके पिता ही एक-दूसरे का सहारा थे। सोनू के पिता रिक्शा चलाते थे। दिनभर मेहनत करते और शाम को घर लौटकर बेटे के लिए खाना बनाते। सोनू अक्सर कहता— “पापा, आप इतना काम मत किया करो।” पिता मुस्कुराकर कहते— “तू बड़ा आदमी बन जा बेटा, फिर मैं आराम ही आराम करूँगा।” सोनू पढ़ाई में बहुत अच्छा था। उसका सपना था कि वह बड़ा होकर डॉक्टर बने। पिता उसकी इस बात को सुनकर हमेशा कहते— “तू डॉक्टर बनेगा तो गरीबों का इलाज मुफ्त करना।” सोनू हँसकर कहता— “आपका भी।” पिता मजाक में कहते— “मेरा इलाज तो तू अभी भी कर सकता है।” “कैसे?” “बस रोज मेरे साथ बैठकर खाना खा लिया कर।” दोनों हँस पड़ते। लेकिन कुछ महीनों से पिता की तबीयत खराब रहने लगी थी। सोनू को पता ही नहीं चला कि बीमारी इतनी बढ़ चुकी थी। उस रात जब पिता रिक्शा चला रहे थे, अचानक उन्हें चक्कर आया और वे सड़क पर गिर पड़े। किसी राहगीर ने उन्हें अस्पताल पहुँचाया। और अब सोनू उसी अस्पताल के गलियारे में बैठा था। उसके पास ज्यादा पैसे नहीं थे। जेब में केवल दो सौ रुपये थे। वह भगवान से बस एक ही प्रार्थना कर रहा था— “मेरे पापा को ठीक कर दो।” कुछ देर बाद एक डॉक्टर बाहर आया। सोनू तुरंत खड़ा हो गया। “डॉक्टर साहब... पापा ठीक हैं?” डॉक्टर कुछ क्षण चुप रहा। फिर उसने सोनू के कंधे पर हाथ रखा। “ऑपरेशन हो गया है। अभी खतरा टल गया है।” सोनू की आँखों में आँसू आ गए। “मैं उनसे मिल सकता हूँ?” “अभी नहीं। सुबह मिलना।” सोनू ने राहत की साँस ली। वह अस्पताल की कैंटीन के बाहर रखी एक खाली कुर्सी पर बैठ गया। थकान के कारण उसकी आँख लग गई। सुबह जब उसकी आँख खुली तो उसके सामने एक बुजुर्ग आदमी खड़ा था। सफेद बाल, पुराना कुर्ता और हाथ में चाय का कप। उन्होंने चाय सोनू की तरफ बढ़ाई। “ले बेटा।” सोनू ने चाय लेने से मना किया। “मेरे पास पैसे नहीं हैं।” बुजुर्ग मुस्कुराए। “पैसे नहीं माँगे मैंने।” सोनू ने चाय ले ली। “आप कौन हैं?” बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए कहा— “बस समझ ले, इस अस्पताल का पुराना मरीज हूँ।” बुजुर्ग रोज उसी खाली कुर्सी के पास आकर बैठने लगे। सोनू भी उनसे बातें करने लगा। एक दिन सोनू ने पूछा— “आप रोज यहाँ क्यों आते हैं?” बुजुर्ग ने सामने देखते हुए कहा— “किसी का इंतजार है।” “कौन?” बुजुर्ग मुस्कुराए। “मेरी बेटी।” “वह कहाँ है?” “बहुत दूर।” “कब आएगी?” बुजुर्ग ने कोई जवाब नहीं दिया। सोनू ने फिर पूछा— “क्या वह आपसे नाराज है?” बुजुर्ग की आँखें भर आईं। “नहीं बेटा... नाराज तो मैं उससे था।” “क्यों?” उन्होंने धीरे से कहा— “क्योंकि वह अपने सपनों के पीछे भागना चाहती थी और मैं चाहता था कि वह मेरे पास रहे।” सोनू चुप हो गया। बुजुर्ग ने बताया कि उनकी बेटी पढ़ाई करके दूसरे शहर चली गई थी। पिता को लगा था कि बेटी उन्हें छोड़कर जा रही है। गुस्से में उन्होंने बेटी से कह दिया था— “अगर जाना है तो फिर कभी वापस मत आना।” बेटी चली गई। कुछ साल बाद खबर आई कि वह विदेश चली गई है। फिर फोन आने बंद हो गए। बुजुर्ग को अपनी गलती समझ आई, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उन्होंने धीमी आवाज में कहा— “मैंने उसे एक बार भी नहीं कहा कि मुझे तुम पर गर्व है।” सोनू उनकी तरफ देखता रहा। उसे अपने पिता की याद आ गई। उस दिन शाम को जब वह पिता से मिलने गया तो पिता अभी भी बेहोश थे। सोनू उनके पास बैठकर उनका हाथ पकड़कर बोला— “पापा... मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा।” कुछ देर बाद पिता की उँगलियाँ हल्की-सी हिलीं। सोनू की आँखों से आँसू निकल आए। अगले कुछ दिनों में पिता की हालत सुधरने लगी। सोनू हर दिन उसी खाली कुर्सी पर बैठकर बुजुर्ग का इंतजार करता। लेकिन एक दिन वह बुजुर्ग नहीं आए। दूसरे दिन भी नहीं। तीसरे दिन भी नहीं। सोनू ने अस्पताल के कर्मचारी से पूछा— “वह बूढ़े अंकल कहाँ हैं?” कर्मचारी ने हैरानी से पूछा— “कौन?” “जो रोज यहाँ बैठते थे... सफेद बाल वाले।” कर्मचारी कुछ पल चुप रहा। फिर बोला— “बेटा, तुम जिस आदमी की बात कर रहे हो, वह तो इस अस्पताल में पिछले छह महीने से भर्ती ही नहीं था।” सोनू के पैरों तले जमीन खिसक गई। “लेकिन मैं उनसे रोज बात करता था।” कर्मचारी ने खाली कुर्सी की तरफ देखा। “वह कुर्सी तो कई महीनों से खाली है।” सोनू कुछ नहीं बोल पाया। उसी समय उसके पिता ने कमरे से आवाज दी— “सोनू...” वह दौड़कर कमरे में गया। पिता अब होश में थे। उन्होंने बेटे का हाथ पकड़ लिया। “तू किससे बातें करता था बाहर?” सोनू ने उन्हें सब कुछ बता दिया। पिता काफी देर तक चुप रहे। फिर उनकी आँखों में आँसू आ गए। “शायद वह आदमी तुम्हें वही समझाने आया था, जो मैं तुम्हें कभी नहीं समझा पाया।” सोनू ने पूछा— “क्या?” पिता ने उसका हाथ दबाया। “बेटा, जिंदगी में अपने सपनों के पीछे जरूर जाना। लेकिन उन लोगों को कभी मत खोना, जो तुम्हारे सपनों के लिए अपना जीवन लगा देते हैं।” सोनू पिता के सीने से लग गया। कुछ महीनों बाद पिता पूरी तरह ठीक हो गए। सोनू ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। वर्षों बाद वह डॉक्टर बन गया। उसने शहर में एक छोटा-सा क्लिनिक खोला, जहाँ गरीब लोगों का इलाज बहुत कम पैसे में किया जाता था। क्लिनिक के एक कोने में उसने एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी रखी। उस कुर्सी पर एक छोटा-सा कागज चिपका था— “यह कुर्सी उस इंसान के लिए है, जिसने मुझे सिखाया कि अपनों को खोने से पहले उन्हें समझ लेना चाहिए।” एक दिन सोनू का पिता क्लिनिक में आया। उसने कुर्सी देखी और पूछा— “यह किसके लिए है?” सोनू मुस्कुराया। “उस इंसान के लिए, जो मुझे तब मिला था जब मुझे उसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी।” पिता ने पूछा— “वह कौन था?” सोनू ने खिड़की के बाहर देखा। हल्की बारिश शुरू हो चुकी थी। वह धीरे से बोला— “पता नहीं पापा... शायद कोई इंसान था, शायद मेरी माँ की दुआ, या शायद भगवान का भेजा हुआ कोई संदेश।” पिता ने उसके सिर पर हाथ रख दिया। दोनों कुछ देर चुप रहे। खाली कुर्सी सामने थी। लेकिन उस दिन पहली बार सोनू को वह कुर्सी खाली नहीं लगी। क्योंकि कुछ लोग हमारे जीवन से चले जाने के बाद भी हमारे भीतर बैठे रहते हैं। और कुछ मुलाकातें इतनी छोटी होती हैं कि हमें उनका अर्थ बहुत बाद में समझ आता है। कभी-कभी जिंदगी हमें किसी इंसान के रूप में एक संदेश देती है। बस जरूरत होती है... उसे समय रहते पहचान लेने की।