Santosh kumar koli ' अकेला' 08 Mar 2026 कविताएँ समाजिक आम आदमी 12909 0 Hindi :: हिंदी
होने को तो सीधा, अपने पर आ बदल दे तख़्त। खुद का नहीं बदलता, औरों का बदल दे वक्त। है तो गूंँगा, बहरा, वक्त पर बोलना रक्त। ऐसे हार का हार, वैसे हारे भूप, भगवान, भक्त। ऐसी वज़ा, है भीष्म, भीरु, डरता सिपाही देख। अपने पर आ जाए, सिपाह दे घुटने टेक। ऐसे डरे टोटके से, वैसे कुछ न बिगाड़े मीन मेख। ऐसे नाकारा, निकम्मा, वैसे श्वेद स्याही से लिखे अमिट लेख। ऐसे तो दासानुदास, वैसे है मन का राजा। सुन ले तो अनकही सुने, नहीं तो जग बजा को बाजा। ऐसे उसका कुछ नहीं, वैसे राज- काज, कार्यालय हाजा। खुद की क़िस्मत नहीं, खोले औरों की क़िस्मत दरवाज़ा।