मोती लाल साहु 06 Oct 2025 कविताएँ अन्य #आत्मज्ञान #आध्यात्मिकता #वेदों का सार #जीवन का उद्देश्य #मैं कौन हूं #सत्य की यात्रा #मोक्ष #स्वयं_की_खोज #परम_शांति #ईश्वर_मिलन #दार्शनिक_कविता 12308 0 Hindi :: हिंदी
जहाँ तक है यह सृष्टि पसारी, वहाँ तक फैली है अंधियारी। पर एक प्रकाश है भीतर ही, जो करता है जीवन की तैयारी। यह प्रकाश नहीं दूर गगन में, न ही किसी पोथी या पठन में। यह तो है सत् का सूक्ष्म अनुभव, बस जागृत है अपने ही तन-मन में। स्वयं को जानने की यात्रा 'मैं कौन हूँ' यह प्रश्न जब जागा, तब हृदय ने अपना द्वार तागा। तत्व रूप से जो अनुभव होता, वही है स्वयं का सत्य उजागर। छोड़ बाह्य की सब उलझनें, निज अंतर में ही शांति है बुनी। हो गई जब होने की स्पष्टता, फिर जीवन की हर बात है धुनी। ईश्वरीय ओज का आगमन जिस पल ज्ञान की ये राह मिली, उस पल ईश्वर की आभा खिली। फिर तन, मन, वचन और कर्म में, बस ओज की ही धारा है मिली। नृत्य करे मन, वचन में हो सत्य, कर्म बनें सेवा, प्रेम का नित्य। हर श्वास बने अब साधना अपनी, समा जाए आत्मा परमात्मा में, जहाँ नित्य। परम शांति की प्राप्ति यही वेदों का, ग्रंथों का सार, यही संतों का स्पष्ट इक़रार। आत्मज्ञान से होता है दर्शन, मिलता जीवन को मूल उद्देश्य का आधार। जब यात्रा हुई पूर्ण और शांत, तब अनंत शांति का हुआ आगमन। जीवन की धारा फिर अमर हुई, यही है मुक्ति, यही ईश्वर-मिलन। -मोती