महेश्वर उनियाल उत्तराखंडी 21 Jun 2026 कविताएँ देश-प्रेम 333 0 Hindi :: हिंदी
अपना गांव कितना सुन्दर अपना गांव यहां मिले वृक्षों की छांव। प्रकृति की है, छटा निराली चारों तरफ है हरियाली नहीं कोई कोलाहल भारी अफरा-तफरी, मारा-मारी। मेरी जन्म स्थली है यह पवित्र माटी, हिमालय की वर्फीली चांेटी भरी हुई फूलों की घाटी। गंगा यहीं से बहती है सब पापों को सहती है, अमृत है इसका जल इसकी हर धारा कहती है। पहाड़ों का यहां पहरा है जिस पर जीवन ठहरा है। गांव है देश की अमूल्य पूंजी विकास की यही है कुंजी। आओ जोड़े अब, गांव से नाता नीरस शहर हमें नहीं भाता। गांव का पानी, और जवानी देश के नाम कुर्बान है। गांव में बसता है, मेरा भारत गांव ही इसकी जान है। रचनाकार- महेश्वर उनियाल 7579155644