महेश्वर उनियाल उत्तराखंडी 21 Jun 2026 कविताएँ समाजिक 329 0 Hindi :: हिंदी
‘‘बेरोजगारी का सफर’’ यारों मै पढ़ता ही जा रहा हूं, उम्र में बढ़ता ही जा रहा हूं । घर वाले मेरी शादी के लिए अड़े है, मेरे सारे सपने मेरे सामने खड़े है। रिश्तेदार भी चाहते है, कि मै घर-बार जोड़ दूं पर मै नहीं चाहता, कि अभी से पढ़ाई छोड़ दूं। अब सोच-सोच कर ख्याल आता है, कभी पढ़ाई का, कभी शादी का पूछता हॅू तो सब कहते है, कि ये दौर है आजादी का और वो दौर होगा बर्बादी का। मेरे पापा कहते है कि कर ले शादी जब तक मै ज़िन्दा हॅू, लड़की वाले पूछते हैं, कि लड़का क्या करता है जिस पर मै शर्मिंदा हॅू। फूल सा चेहरा अब तीर सा बन गया है, वीर सा शरीर अब लकीर सा बन गया है, राजा सा सुकून अब फकीर सा बन गया है। बाल झड़ने लगे है दांत भी सड़ने लगे है, सही बात पर भी अब लोग लड़ने लगे हैं तन्हाई के इस आलम में गालों में गडृढ़े पड़ने लगे है अब अपने भी बेगाने लगते जा रहे है, मिल रहे है जो भी दोस्त मेरे घाव और जला रहे है, कि, कर ले यार शादी तू हम तो तेरी शादी में डांस को मरे जा रहे है। भरोसा है खुद पर मुझे मै खुद को खूब जानता हूॅ इरादे है मेरे, पक्के इतने, कि मै किसी की भी नहीं मानता हॅू। करूंगा मै मेहनत इतनी कि मुझे नौकरी मिल जायेगी, और यदि नौकरी मिल गई, यारों तो छोकरी तो मिल ही जायेगी। रचनाकार- महेश्वर उनियाल 7579155644