महेश्वर उनियाल उत्तराखंडी 19 Jun 2026 कविताएँ प्यार-महोब्बत #भिगो दिया मेरे तन को आज #महेश्वरउनियाल #झलकता 6076 0 Hindi :: हिंदी
भिगो दिया मेरे तन को आज दिल हुआ बेताब मेरा, झकझोर दिया मेरे मन को आज लहु झलकता आखों से, भिगो दिया मेरे तन को आज गहरे घने बादल में जाक,े घटायें दिल पर बरस रही। नूर जहां सी एक किरण, मिलने को तरस रही। कभी ओंठो की सिसकी आती कभी चुड़ियों की खन-खन बजती, कभी आती पायल की आवाज लहू झलकता आंखों से, भिगो दिया मेरे तन को आज। सारे पैमाने तोड़कर जब मै बाहर आया पुकारा उसे जोर से मैने पर उसने छुपाया वह राज लहू झलकता आंखों से, भगो दिया मेरे तन को आज। रब ने उसे क्यों ऐसा बनाया बनाने पर क्या जश्न मनाया जो कर दिया ऐसा श्रृंगार लहू झलकता आंखों से, भिगो दिया मेरे तन को आज। लेखक- महेश्वर उनियाल 7579155644