महेश्वर उनियाल उत्तराखंडी 19 Jun 2026 कविताएँ प्यार-महोब्बत #बिरह की ज्वाला #प्यार #महेश्वरउनियाल 3203 0 Hindi :: हिंदी
’’बिरह की ज्वाला’’ न जाने क्यों आज ये दिल मेरा रो गया दिल में मेरे वह प्यार के बीज बो गया। वह मोती मुझसे, जाने कहां खो गया मेरे जीवन से जब वह अलग हो गया। उसकी याद में पल-पल तड़पता है दिल उसको मिलने की खातिर हर पल धड़कता है दिल सांस भी मेरी सिसक जाती है तन्हा लम्हों में जब उसकी याद आती है। बेबस कर देती है मुझको रोने में खुदाई जब खुद उसकी कहानी सुनाती है। विरह की मारी मै घट-घट में फिरती हंू उठती, सम्भलती और गिरती हंू एक भयानक प्रलाप से, मै धरती और आसमॉं को चीरती हंू। एक शोला दिल में, सुलग रहा है अब तो मुझको यह निगल रहा है इसके तपने से धीरे-धीरे विरह की ज्वाला में, यह दिल अब तो पिघल रहा है। लेखक- महेश्वर उनियाल 7579155644