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खुद को समझ लेना कभी

Nisha Kumari 01 Jul 2026 कविताएँ समाजिक स्त्री का मन 1079 0 Hindi :: हिंदी

स्त्री के मन को समझ लेना कभी
अंतरात्मा की उथल पुथल को भी सुन लेना कभी 
इतना भी कठिन नहीं होता स्वयं को समझना
फुरसत मिले तो खुद को समझ लेना कभी।।

छोटी सी बिंदी और माथे का चक्र
बड़ी प्यारी सी आंखे,प्यारे नयन नक्श 
बालों को भी सवार लेना ,सुलझाना कभी
कोमल मन को न छुपाना कभी। 

मोह लेना  सबको मोहिनी बनकर 
अंदर छुपे प्रेम को भी दिखाना कभी
हो तुम भी शर्मों हया वाली ये भी जताना कभी
फुरसत मिले तो खुद को समझ लेना कभी।

जो तब भी ना समझे तुम्हे कोई 
भूल जाना सबको खुद को न भुलाना कभी
अपनी खुशी की परवाह खुद ही करना
उम्मीद किसी से ना लगाना कभी।।

अपने व्यक्तित्व को भी निखारना 
स्त्री खुद में ही हो पूर्ण
सबको एहसास भी कराना कभी
फुरसत मिले तो खुद को समझ लेना कभी।।

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