Santosh kumar koli ' अकेला' 19 May 2023 कविताएँ समाजिक पत्थरफोड़ 15143 0 Hindi :: हिंदी
गुल्म कंटक प्रहार को, बनाता आहार। तपन कफ़न न उढ़ा सकी, उगल, उछल, आकार। असि फ़र्शी सलाम करे, देख जिजीविषा की धार। तपन ही खुदरंग से, करवाती साक्षात्कार। न जोत न जोतांत, है आश्म आवरण। जीवट, जज़्बा, जीवथ ज़िद, है पोषण। सहन पण है जीवितेश, सहन जीवन रण। पत्थर ही पट पढ़ सके, तेरा व्योम व्याकरण। काश! तू समझा पाता, छाती की पाटी। जीवन दीपक, संघर्ष तेल, आशा जीवन बाती। दुख झरोखे से देखो, सुख नव प्रभाती। दुख सान ही, जीवन धार चमकाती। जीवन धार चमकाती।