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शुरुआत

Umendra nirala 08 Mar 2025 कविताएँ राजनितिक 24996 0 Hindi :: हिंदी

डूबता है, तब भी उसमें आस 
‎होती है,प्रभात कि 
‎शांत हो यदि कोई तो होता उनमें 
साहस उत्पात कि 
‎अब जरुरत है,
‎फिर से एक नयी शुरुआत कि।
‎
‎थिरकता है, मृग जब मस्त चाल में 
‎बैठता है बहेलिया उसके घात को। 
‎खिलाफ कि बात फैलती ऐसे कि, 
‎भयावह दावानल हो जैसे रात कि। 
‎अब जरुरत है,
‎फिर से एक नयी शुरुआत कि।
‎
‎
‎आदमी-आदमी को जनता कहाँ है?
‎जानता तो नाम सुन बात न करता जाति कि।
‎यदि जाति से भी पहचान न हो 
‎बात करेगा बेझिझक उसके काम कि
‎अब जरुरत है,
‎फिर से एक नयी शुरुआत कि।
‎
‎हो अँधेरी रात या छाई घनघोर घटा,
‎मिटेंगे सब कुछ है जरुरत ताप कि।
‎दर्द कि कराह हो या बेबस लाचार,
‎आन पड़ी है हरने को संताप कि।
‎अब जरुरत है, 
‎फिर से नयी शुरुआत कि।
‎
‎
‎         कविता शीर्षक -शुरुआत
         नाम - उमेन्द्र निराला 
         अध्ययन - इलाहबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय प्रयागराज (उ. प्र.)
         पता- ग्राम हिंनौती, जिला -सतना, मध्यप्रदेश 
   लेखन दिनांक - 29-01-2025
‎                                    
‎

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