Santosh kumar koli ' अकेला' 26 Feb 2025 कविताएँ समाजिक तरणी तड़ाग संवाद 21253 0 Hindi :: हिंदी
सरसर तरणी तैरती, गहरी झील के सीने पर। गद्गद मद के गद के गद से, खुद के किश्ती होने पर। मुझे सरूर, इसका टूटा ग़रूर, विवश जीवन जीने पर। एक झोका गहरी पैठ नौका, समझ न सकी उथलने पर। परहित हेतु सेतु बनती, आवा-जाही पुल पर। तेरी सेतु बनती है, मेरी छाती के बल पर। एक पल सके न चल, बिना थल, जल पर। तेरे कुल का कुल, आश्रित है मेरे कुल पर। कई आई, कई गई, कई डूबी कई तट पड़ी हुई। कबाड़ में तबदील हुई, जो रहती थी अकड़ी हुई। उसको लोग पूछते, जो मुझसे है जुड़ी हुई। जो मूल से भट्की, उसकी आज बिगड़ी हुई।