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खुद से खुद को हारो ना
कविता -खुद से खुद को हारो ना। थक कर बैठ गया पथ पर क्यों खुद से खुद को हारो ना, मन से ही सब जीत हार है मन को अपने मारो ना। अंधकार को चीर न
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मन तू और तेरा गति क्या....
पलक झपकते- क्या सवारी तुम्हारी, कौन सा क्या परमिशन कहीं भी पहुंच तुम्हारी राज तुम्हारा- मन-बुद्धि-अहंकार, करते हैं सलाम तुम्हें च�
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बलात्कार एक अपराध
( अतिआवश्क बात में अपने बारे में बतादू मुझे प्यार और महोबत और इन दिखावटी दुनिया के बारे में नहीं लिखना आता में हमेशा सच कि दुनिया में यक
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जोशीमठ
जोशीमठ यह नाम काफी प्रचलित हो रहा है। चलो पहले हम इसके बारे आपको थोड़ जानकारी देते है। भारत के उतर में बसने वाला उत्तराखंड के देव भूमि �
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वह शहर
मुझे आजकल न जाने क्यों ? वह शहर .वह मोहल्ला ,वह गली, याद आती है ! मैं .जब भी अपने घर के बालकनी में खड़ी होती हूं ! मुझे अपना वह छोटा सा शहर य�
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दे दो मुझे तुम प्रेम अपना....
आए हैं हम- सपनों की दुनिया में, हमें है तलाश हक़ीक़त की मुझको पता है- रहता है वो सबके दिलों में, दे दो मुझे तुम प्रेम अपना -मोती
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सितारों का आशियाना....
चांदनी रात में- सितारें खिलते हैं, आसमानों में किसी ने ये जाना- आशियाना बसा है, दिल की दुनिया में गगन तो है छाया -मोती
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आंतरिक दुनिया और जगत....
संपूर्ण दृश्य जगत, प्रतिच्छाया है- आंतरिक दुनिया का -मोती
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ज़िंदगी के सफ़र में आओ चलें हम....
ज़िंदगी के- सफ़र में आओ चलें हम, मिलेंगे मंज़िल इन राहों में हमराही मेरे हम न- कभी होंगे जुदा इन राहों में ग़म भुला के सदा- हम रहेंगे
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पल पल गुज़र रहे हैं....
वो दिन गुज़र गए- चले गए जिंदगी से, कहीं दूर देश-परदेश में पल-पल गुज़र रहे हैं लौट के आए नहीं- ना कोई संदेशा आया, पल-पल गुज़र रहे हैं अब
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गुरू महिमा
पाहन बीच पावक का बास, पाहन रहे अज्ञात। सत्य की चोट लगे सतगुरू की, हो असत्य का पात। मृग नाभि में बसे कस्तूरी, ज्यों घन में बरसात। ढूंढ़ च�
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कण कण को
अम्बर वरसे नैना तरसे बून्द बून्द पानी को प्यासा मनवा तरसे मुठी भर भूख को अंजुरी भर जल को अतृप्त अखियाँ तरसे ठोप ठोप नीर बहे अधर मे�
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