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बह चली बसंती वात री
कविता - बह चली बसंती वात री। बह चली बसंती वात री। मह मह महक उठी सब वादी खिल उठी चांदनी रात री। सब रंग-रंग में रंग उठे भर अंग अंग मे�
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मैं हु एक पेड़
मेहु एक पेड मेहु बच्चो का साथी। मेहु थकियारोंका आराम कक्ष मेहु पंछीयोंका घर। कोई हैं निर्भर मुझ पर कोई हैं रेहता जिंदा मुझ पर। में भ
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होली
वेर भाव है होलिका, प्रेम भाव प्रह्लाद। वेर-प्रेम संयोग में,,शेष रहे आह्लाद।।
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गलतीया दुसरो पर सिखी जाती है
गिरकर उठना सिखों, गलतीया तो हर किसी से होती है हमसे या तुमसे भी गलतीया दुसरो पर सिखी जाती है। अपने आप पर नहीं , अगर अपने आप पर सिखोंगे त�
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तेरा अनुराग...
तेरा अनुराग.... हे अतुल हे अनुप ! जगत में - सृष्टि का ताज है मानव तन में- समा रहे हो, जीवन के बीज हो तुम ये जीवन - जो खिल रहे हैं , तुम ही प्
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मैं उस तत्व का अंश हूं....
मैं उस तत्व का अंश हूं जो पृथ्वी,जल,अग्नि, वायु और आकाश का गति है समस्त ब्रह्मांड- का सृजनात्मक स्रोत, मेरे अंदर से विकसित होकर मेरे �
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संपूर्ण ब्रह्मांड का स्रोत....
निज स्वरूप- में स्पर्श है सांसों का, जो स्रोत है जीवन का। ये अनुराग है- ईश्वर का या संपूर्ण, ब्रह्मांड का स्रोत मौजूद है -मोती
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सभ्य नागरिक
सुख शांति के लिए मानव तो जन्म से ही प्रयास करता है, शिक्षा के द्वारा ही वह तो मानसिक शक्ति को पाता है। शिक्षा के द्वारा ही वह तो सभ्य �
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तत्व ज्ञान के बिना शून्य....
संपूर्ण जीवन की- सार्थकता समस्त कर्म, तत्व ज्ञान के बिना शून्य समस्त कर्म- तत्व ज्ञान के बिना शुन्य! -मोती
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श्रेष्ठतम मानवीय गुण....
श्रेष्ठतम मानवीय गुण- स्वयं का रूप को तत्व ज्ञानी, समय के महापुरुष से जानना श्रेष्ठतम मानवीय गुण! -मोती
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चालू हे सखी होरी में....
चालू हे सखी होरी में! चालू हे सखी रंग गुलाल ले आओ री। देवरी में आंगना में रंगोली सजाओ री।। कौन बजावे ताशा हम बजावे ढोलकिया। चालू हे स�
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ओस के ये मोती तपती किरण में उड़ रही है....
ओस के ये मोती- तपती किरण में उड़ रही है! मन को लुभा रही है, माया की ये छाया उड़ रही है दृश्य जग-जन- भंवर जाल में उलझ रही है काया में- आती
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