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एँ,पर्वत ,कभी ,तुम ,मुझे,। एकाग्र पथ पर,डटे ,रहने का ,। उपहार दो,। मेरे ,इन नयनों ,में ,जो छवि है ,तुम्हारी, दृढ़ ,एवं कठोर,‌‌ हालातों ,से ,म� read more >>
अपनों को खुश करने की कोशिश में कई अपने मुझसे रूठ गए कितना भी कर लो खुश करने का सबको पर कुछ तो रूठ ही जाते हैं सबको हरदम खुश रख सकूं यह क� read more >>
एक तो सिर्फ सोचते है, दूसरे तो सिर्फ बोलते है, तीसरे तो सिर्फ करते है, लेकिन चौथे तो कुछ भी नहीं करते! read more >>
उड़ चले पर्वत वह भी, जिनके पास ज़मीन थी l हर कश्क खत्म, अश्क में नयन नमl जीना दुर्लभ है नहीं l बिन पीर के युद्ध क्या l मल्ल युद्ध है जिंदगी read more >>
धरती होगी ऊसर, आहा, आह‌‌ में बदल गया। लंबी दूरी नाप रहा, स्वार्थ- सीढ़ी से सफ़र। बढ़गी पैदावार होगी, गुण हेतु धरती बंजर। रिश्ते नात� read more >>
हितैषी तब तक हितैषी रह पाता है, जब तक उसके निजी स्वार्थ में कोई आँच नहीं आता है। जब उसके उसके निजी स्वार्थ पर कोई आँच आ जाता है, तो वो हि� read more >>
तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में शरद ऋतु का गुणगान करते हुए लिखा है- बरषा बिगत सरद ऋतु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई॥ फूलें कास सकल महि छाई� read more >>
दहेज की आग एक रसोई से धुआँ उठा, आग लगी, लपटे बाहर निकली, शोर में कुछ चीखें चिल्लाती, भीड़ में लोगों की कानों आयी, बचाओ-बचाओ, कोई बचाओ, आग read more >>
कविता -तुम कैसी मां हो? फेंक चलीं क्यों ?दिल रोता है! कूड़े में अब दम घुटता है! अंदर ही अंदर दहता है! कितनी विह्वलता है ! मां की read more >>
दूसरों के बारे में तो हम बहुत चाव से और बहुत ही उत्सुकता पूर्वक बातें करते हैं उनकी अच्छाइयां उनकी बुराइयां परंतु कभी-कभी हमें स्वयं क read more >>
हमारी जिंदगी भी एक किताब की तरह होती है जिसमें मुझे यह नहीं पता होता है कि अगले पन्ने पर क्या लिखा होगा और हमें क्या ज्ञान प्राप्त होगा read more >>
न जाने क्या देखा मैंने उसकी आंखों में जो आज भी उम्र के इस दौर पर याद करके दिल को बेचैन कर देती है read more >>
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