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है धरती पर नाज़ पिता, संघर्षों कि आवाज़ पिता! पुरूष कर्म इक नाम पिता का, सन्तान कर्म पर साज़ पिता!! है धरती कि महा धरा पर, read more >>
देती ही रही है झल्क वन्दना, अनुन्य व्यथा के चरणों से! शाशन का है ईक बोल अविध, अनुशाशन के पन्नों पे!! ये अनुशाशन ईक धार श्रृंखल read more >>
स्वछंद आसमां ए कलम कुछ लिख दे ऐसा जो मानव को सबक सिखाये धरती को तो बाँट लिया है आसमां ही बच जाए मानव की तो मति बड़ी है भव क� read more >>
कविता -विश्वास पत्थर तो पत्थर दिल सा मुलायम कहां! किन्तु! पत्थर दिल भी मुलायम होता वहां तो! बेजान कठोर कर्कश ठोकरें देने वाले पत्थर read more >>
कविता -विश्वास और भरोसा पहाड़ों के बीच टेढ़ी मेढ़ी रस्ते पर बस चल रही थी जीवन की रेखा सी रस्ते पर ऊपर नीचे चढ़ रही थी सीधे रस्ते पर च� read more >>
कविता -काले बादल मौसम बरसात की चांदनी रात थी चमकते तारों में सजी धजी चांद की क्या बात थी, देख रहा था मैं उसे उसके चमकते शान को गरिमा औ read more >>
प्रतीरोध बनकर समुन्द्र कि तलें, बुन्दों के विनाशक रूप को! विकाश के पथ पर अग्रसर कर, जीव धरा पर पुजनीय बनाती है!! जल कि बुन्दें त� read more >>
घर में पिताजी हैं, तो नौकर के पैसे बचते हैं। सब्ज़ी खरीदने, बच्चों को स्कूल लाने, ले जाने में जचते हैं। पिताजी घर में, नौकर नहीं, तो क्या read more >>
मैं ,,जीयूं इस तरह , कि विभव में भोर हो जाए, मैं,, जीयूं इस तरह ,की कविता हर ओर हो जाए, देश ,लिखने वाले द्वेश नहीं लिखा करते, मिट्टी में भी सुग read more >>
शब्द कि अविचल झटा से, क्या नया सम्मान दूं! संघर्ष कि कंवलीत कथा को, मै पिता का नाम दूं!! संघर्ष कि कंवलीत कथा को, मै पित read more >>
अरसे बाद,खुद को पहचान पाई हूं, ये मेरे अहसास की सुगन्ध है,। समय का इक पहलू ,मेरा बड़ा भयभीत रहा , फिर भी मुसाफिर इक जिन्दाबाद रहा,। ज़िन्� read more >>
वक्त चाहता था हमसे बस वक्त दो घड़ी की गर काश हम दे पाते तो कुछ और ही बात होती । बेहद किया था जाया व्यर्थ हमने भी वक्� read more >>
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