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हे सम्बन्ध पुराना तुमसे-दे गये हमे अनेक धरोहर
दे गये हमे अनेक धरोहर प्रकृति का ये दृश मनोहर उसके रक्षक सारे जन , है सबकी यह दित्य धरोहर ये बह�
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स्वार्थ-मैं उन्हें जानता हूँ पर वो मुझे पहचानते नही
मैं उन्हें जानता हूँ पर वो मुझे पहचानते नही , बिना काम के वो मुझको
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जीवन है कि आना जाना- जन्म हुआ फिर हे बचपन आना
जीवन है कि आना जाना जन्म हुआ फिर हे बचपन आना बचपन आया फिर यौवन आना यौवन आया फिर बुढ़ापा आ�
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बालकनी में कौआ- एक पंछी होकर भी अपने दिल में इंसानियत की झलक दिखा गया
कौआ एक समय की बात है, पढ़ाई के लिए बाहर दूसरे शहर में किराये का एक नया कमरा लिया है, उस के एक तरफ बालकनी लगी हुई थी। मुझे यहाँ पर सब कुछ बह
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मित्रता-कभी कोई प्रमाण नहीं माँगती
मित्रता, कभी कोई प्रमाण नहीं माँगती । नही इसे कभी प्रमाणित किया जा सकता है।। यह दिल से जुड़ाँ एक गहरा लगाव है। आपका मित्र आपको हर एक �
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जिम्मेदारी-सुबहाँ सुबहाँ रोज जगा देती है
कौन, सुबहाँ-सुबहाँ रोज जगा देती है। रात अन्घेरी को भगा देती है । सुबहाँ हो गई उठों ऊमीद की आवाज़ से सवेरे की रोशनी दिखा देती है।। रू�
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देख चेहरा अपने मां-बाप का हर प्रयास यही कि
जब लगे की जिंदगी में काम का बहुत प्रेशर है तो देखना चेहरा अपने मां बाप का जब लगे कि जिंदगी बहुत कठिन है या कि मुझे यह ना हो पाएगा तो
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पर्व मकर संक्रांति का-सूर्य उत्तरायण हुए रुचिकर हुआ उजास
सूर्य उत्तरायण हुए,रुचिकर हुआ उजास। पर्व मकर संक्रांति का,भव्य बहुत ही खास।। सूर्य उत्तरायण हुए,देंगें सबको लाभ। होगा दिव्य विकास �
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वह राम कहां से लाऊं मैं- शबरी के जूठे बेरों से जो तनिक नहीं
वह राम कहां से लाऊं मैं शबरी के जूठे बेरों से जो तनिक नहीं भी बैर किया सब ऊंच - नीच के भेदों से जो ना अपना ना गैर किया उस पुरषोत्त�
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आसमान की रौनक पतंगो का त्योहार
आसमान की रौनक पतंगो का त्योहार गुलज़ार रहे सबका घर द्वार हैप्पी मकर संक्रांति ज्योति यादव के कलम से कोटिसा विक्रमपुर सैद�
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मैं पतंग तेरी तु बन जा डोर मेरी-उड़ा दे मुझे इन हवाओं में
मै पतंग तेरी तु बन जा डोर मेरी उड़ा दे मुझे इन हवाओं में सैर कर लूं गर्दिश की चांद को मांग लाऊं अपनी दुआओं में दुर होके हमें ललचाता है
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अब चुनाव आ गया-कौवा सा कांव कांव गांव गांव छा गया
अब चुनाव आ गया कौवा सा कांव कांव गांव गांव छा गया लगने लगा है कि अब चुनाव आ गया। पांच साल बाद फिर याद अब आ गया पूछ पूछ ह�
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