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वादों से मुकरना-हमने कभी सीखा नहीं
वादों से मुकरना, हमने कभी सीखा नहीं। कर्तव्य को निभाना, हमने कभी छोड़ा नहीं। दुनिया की हर चाल की, खबर रखता हूँ मैं- अपने हक के लि�
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सुबह - सुबह जब साथ में-पीते हैं सब चाय
सुबह - सुबह जब साथ में,पीते हैं सब चाय। रहे खुशी की शुभ घटा, मिट जाते हैं हाय। आपस में हो प्रेम तब, रहे सुखी परिवार_ फिर जीने का है मजा, रहत�
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जिसमें हो सबका भला-उच्च रखें जो सोच
#विधा:-मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" जिसमें हो सबका भला,उच्च रखें जो सोच। अब सबके सुख के लिए,बंद करो उत्कोच। विकसित अपन
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जिसमें हो सबका भला-ऐसा करिये खोज
#विधा :-दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" जिसमें हो सबका भला,ऐसा करिये खोज। भारत का भी नाम हो,चंचल रहिये रोज ।। जिसमें हो सबका
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इतनी सर्दी है कि-जीना मुहाल हो गया
इतनी सर्दी है कि, जीना मुहाल हो गया। सारी शक्ति जैसे, लगता है पानी हो गया। ये कैसा गजब हो रहा है, अजब हो रहा- अब तो मिलवाट का ही, न�
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वक्त कैसा भी आये,-छुटे न कभी अपना ईमान
दुश्मन जो मूँह खोलेगा, तोड़ देंगे उसका गुमान। प्यार लिए प्यार दुष्मनों के लिए, तलवार मेरी जुबान। जिन्दगी के सफर में,अस्त्र - शस्त्र
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बादल बरन-ये छलियों के छली ऐयारों के ऐयार
ये छलियों के छली, ऐयारों के ऐयार। कभी गज, कभी ऊंट, कभी घोटक सह सवार। कभी पौधा, कभी दरख़्त, बिन जड़ आधार। कभी रूई, कभी उलटते, कोह से आकार।
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कई बहाने मौत के-सबको जाना एक दिन धरे रहे सब आस
#विधा:-दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" कई बहाने मौत के,महबूबा यह खास । सबको जाना एक दिन,धरे रहे सब आस।। कई बहाने मौत के,यही पर
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कई बहाने मौत के-होगा जब दीदार
#विधा:-मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" कई बहाने मौत के,होगा जब दीदार। यार मिलेंगे तब गले,खूब करेंगे प्यार। जीवन जीना झूम क
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एक कदम आयुर्वेद की ओर
आयुर्वेद एक ऐसी व्यवस्था है जो आने वाले समय में मानव जीवन को रोगों से बचाने का एक मात्र विकल्प होगी।क्योंकि आज जिस प्रकार से केमिकल क�
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अब कहाॅं पर आ गए-क्या पता हम कब चले थे
अब कहाॅं पर आ गए क्या पता हम कब चले थे अब कहां पर आ गए बचपन गया बीती जवानी झुर्रियां भी छा गए, देखते-ही-देखते जो आये थे वो जा रहें ना सम�
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सुना भी कुछ नही- कहा भी कुछ नहीं
सुना भी कुछ नही, कहा भी कुछ नहीं पर ऐसे बिखरे हैं जिंदगी की कशमकश में कि टूटा भी कुछ नहीं और बचा भी कुछ नहीं...!!
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