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जो बित गया वक्त -वो फिर न आयेगा
(मुक्तक) जो बित गया वक्त, वो फिर न आयेगा। रोशनी के सामने कभी, अँधेरा न आयेगा। हौसला है - जुनून है, चमकीली चाहत है - मोहब्बत के सामने,
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दरिद्रता- सुबह सबेरे तड़तड़ाहट की आवाज कानों में पड़ते ही
दरिद्रता " सुबह सबेरे तड़तड़ाहट की आवाज कानों में पड़ते ही नीद टूटी,मैं जाग पड़ा, देखा कि लोग सूप पीट पीट कर दरिद्र" भगा रहे थे घर के
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मेरे बचपन का गांव- जहां मेरा बचपन बीता था
मेरे बचपन का गांव दिनांक 23/11/2023 ----------- आज कई वर्षों के बाद मुझे अपनी मायके के गांव जाने का अवसर मिला। जहां मेरा बचपन बीता था कुछ समय पश्चा
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संघर्ष और समाज-संघर्ष के बाद समाज कि स्थिति असंतुलित
संघर्ष के बाद समाज कि स्थिति असंतुलित हो जाती लगभग सही क्षेत्रों मे कमोबेश अभाव का ही मंजर होता है। सारे नुकसान कि एक साथ तत्काल भरपाई
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समाज और मनुष्य
समाज मनुष्य को समाज के उपयोग में आने के लिए शिक्षित करता है। कोई भी समाज किसी भी मनुष्य की आत्मिक विकास की चिंता नहीं करता है, यह विकास �
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कुछ समय निकालो-अक्सर हमने लोगों को कहते हुए सुना है
अक्सर हमने लोगों को कहते हुए सुना है । कि अरे !मैं करना तो बहुत कुछ चाहता था। परंतु मेरे पास समय नहीं था जैसे की कोई वह नया व्यापार, करन�
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करते नहीं विचार जो-करते कुछ भी काम
#विधा:-दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" करते नहीं विचार जो,करते कुछ भी काम। आये जब परिणाम तो,लगता उसे लगाम।। करते नहीं विचार जो,औ
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उजला तन किस काम का-काला जब हो सोच
#विधा:-दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" उजला तन किस काम का,काला जब हो सोच। ऐसे जन सब ही यहाँ,करते रहते नोच।। उजला तन किस काम का,जिसक
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करते नहीं विचार जो-उसे बुद्धि है भ्रष्ट
#विधा:-मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" करते नहीं विचार जो,उसे बुद्धि है भ्रष्ट। उल्टे सीधे काम से,करे प्रगति को नष्ट। और गँवा�
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करते नहीं विचार जो-रहे सदा बेरंग
#विधा:-दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" करते नहीं विचार जो,करते कुछ भी काम। आये जब परिणाम तो,लगता उसे लगाम।। करते नहीं विचार जो,औ
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क्या कहूं आज मैं आप से- डरता मैं हूं बहुत पाप से
क्या कहूं आज मैं आप से। डरता मैं हूं बहुत पाप से। मैं प्यार का एक मस्त राही- डरूं नहीं कद की नाप से । (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिं�
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मंज़ूरी-तुम्हारी मुस्कुराहट में तुम्हारी मजबूरी नज़र आती है
"मंज़ूरी" "हमें तुम में तुम्हारी मजबूरी नज़र आती है,तुम्हारी मुस्कुराहट में तुम्हारी मजबूरी नज़र आती है,जब भी तुम्हारे ज़िस्म को छूना
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