काऊ कोऊ प्रियतमा से तौऊ बिन जिव नौऊ भय!
लागु मन ताऊ से जिव अब काऊ भय!!
मझताऊ थाऊ से मै तौउ न पेऊ!
आवु मै घिरी-घिरी जाऊ न पेऊ!!
अर्थ:-
कहने read more >>
कविता - ( खिलवाड़ )
वहशी ने किया शिकार !
हद कर दी सारी पार !!
मानवता हुई शर्मसार !
इंसानियत हुई तार - तार !!
शायद रोया होगा महाकाल !
नाम का तो र� read more >>
शाहरी जम्बर 6
अजी जो लोग जादा सोचते हैं। किसी की जिन्द‌गी के बारे मैं अजो जो लोग जांदा सोचते हैं। किसी की जिलड़गी के बारे मैं वो लोग ही � read more >>
शारंगरी, नंम्बर 2
जूलम करते हैं! अपने ही रैहेम तो गेर करते है। और अगर जो अपने तो दिखावटी हमदरद होते हैं! और गेर तो हकिकत के हमदरद होते है! read more >>