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संदीप कुमार सिंह
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संदीप कुमार सिंह
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संदीप कुमार सिंह
@ sandeep-kumar-singh
, Bihar
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me.
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सक्षम बनें-जीवन संघर्ष है
जीवन में सक्षम बनना अति आवश्यक है। जबतक स्त्री_पुरुष खुद को अन्दर से सक्षम नहीं बनाएंगे तब तक अपने अधिकार को प्राप्त नहीं कर सकते। जीव
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भटक रहा मन बावरा-सच्ची झूठी बात
(दोहा छंद) भटक रहा मन बावरा,सच्ची झूठी बात। सब इसका ही देन है,काली पीड़ित रात।। भटक रहा मन बावरा,रहता कभी न शांत। होता है तब शांत यह,थक�
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आँखों में विद्युत सी चमक हो अंधेरों में भी पकड़ हो
हर हाल में दिल में खुशियाँ ही खुशियाँ रहे, सदा ही होठों पे विराजमान बहार रहे। हाथों में कुछ निर्माण करने की कला भी रहे, कदमों में गज़ब �
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सबका मालिक एक है-अलग अलग है नाम
(दोहा छंद) सबका मालिक एक है,अलग अलग है नाम। इनमें उलझें मत कभी,पूजा जाता काम।। सबका मालिक एक है,सृष्टि सकल के यार। जितना ढूंढों अन्त म�
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घर से निकल आए- घर के लिए पैसे कमाने
घर से निकल आए घर के लिए पैसे कमाने। कई रूप देखे कई सवाल यहां के जमाने। परिश्रम रंग लाया पाया मैंने यहां सबकुछ _ हरेक रत्नों से भरा है आ�
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गाल तुम्हारे रसगुल्ला से कम तो नहीं-हरेक अंग किसी अप्सरा से कम तो नहीं
गाल तुम्हारे रसगुल्ला से कम तो नहीं। हरेक अंग किसी अप्सरा से कम तो नहीं। जिसके आने से नहीं होता है अँधेरा_ तुम तो यार सूर्य की किरण से �
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आईने की तुझे जरुरत नहीं-तुम खुद एक आइना हो
आईने की तुझे जरुरत नहीं तुम खुद एक आइना हो। शीशे जैसा चमकता तेरा बदन तुम एक मृदु हसीना हो। देखने के बाद लोग खुदबखुद चार्ज होने लगता है_
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हरी चुनरिया ओढ़कर-धरती लगती खूब
हरी चुनरिया ओढ़कर,धरती लगती खूब। सावन जल बरसे अभी,चमक रही है दूब। काले बादल मस्त है,वसुंधरा है मग्न_ जो देती है अति खुशी,चाह सभी मंसूब।
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क्या हो गया आज लोगों को- बात बात में लड़ जाते हैं
(मुक्तक छंद) क्या हो गया आज लोगों को बात _बात में लड़ जाते हैं। ईर्ष्या की आग में जलकर लोग स्वयं भस्म हो जाते हैं। खुद मत जलें भाइयों इस �
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नयी हसरतों के दीये जल रहें हैं-यौवन का अभी समय है
नयी हसरतों के दीये जल रहें हैं, यौवन का अभी समय है निर्माण कर ले। संगीत के धुन सा धड़कन भी धड़के, सोला सा रक्त भी अनवरत भड़के। नैनों मे�
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