बहुत अपना है वो, और पराया भी बहुत है
अपना इतना
कि उससे मन की कह लेती हूं
याद आने पर उसकी मुस्कुरा भी लेती हूं
और रो भी लेती हूं
और पराया � read more >>
भेदों की मूर्खता
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जब बिजली पानी एक है,
धरती भी सबकी एक है,
न चांद सीतारें अलग यहाँ,
सूरज भी कहाँ अनेक है,
न अग्नि करती भेद यहाँ,
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कल जैसे थे आज भी वैसे हीं हैं
बस फर्क इतना सा हैं
कल छोटे थे, आज कुछ बढ़े हों गए हैं।
जिन हाथों से उंगलिया थम चला करतें थे।
आज उन हाथों में read more >>