दो पल की जिंदगी हैं,
आज बचपन ,कल जवानी,
परसों बुढ़ापा, फिर खत्म कहानी है।
चलो हंस कर जिए , चलो खुलकर जिए ,
फिर ना आने वाली यह रात सुहानी,
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दोहा छंद "सद्गुण"
सद्गुण सरस सुगन्ध से, महकायें जग आप।
जो आयें संपर्क में, उनके हर लें ताप।।
अंकुश रहे विवेक का, यह सद्गुण सिरमौर।
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