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पर्वत से नदी निकलती, लेकर नई उमंग। कैसे, कौन रोकता है, मिल जाऊं सिंधु के संग। झर- झर, झर- झर झरने बहते, उसको दे देते आधार। एक-एक से मिल बन जा read more >>
जीवन मे मिले हो तुम मेरे, मै धन धान्य से पूर्ण हुआ। जीवन मे मिले हो तुम मेरे, मै धन धान्य से पूर्ण हुआ। पथ मे मेरे अब आलोकित राह का फिर आग� read more >>
कविता-कला सीख लो जीवन में यारो, जीवन जीने की कला आसान कर लो ज़िन्दगी,को छोड़ कर सारी बला। ये रहस्यमय है जिंदगी ना राज जाना है कोई हम � read more >>
कविता-मन की मनमानी मन की मनमानी खुद लिख जाती है अपनी कहानी, मन से ही जीते हम मन से ही हारे मन के आगे न चलती जुबानी, मन की मनमानी----- मन च� read more >>
धन दौल्त कब मांगा उसने हां नारी प्रेम पुजारी थी। क्यों समझें हम अबला उसको वो सदियों से महारानी थी।। हम सत्य शील की बातें समझें अनुसु� read more >>
शीर्षक (भगवान शिव) मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) डम-डम डमरू बाजे भोले नाथ शिव शंकर नाचे। जटाओं में उनके गंगा विराजे। माथे पर उनके चन्� read more >>
* पिता * सुखी उसी का जीवन है जो प्यार पिता का पाते हैं । अपने अनुभव और धैर्य से परिवार का रथ ये चलाते हैं ।। अपने जीवन में श्रम करके परि read more >>
ग्रामीण बाप बेटे पहुंचे शहर की ऊंची इमारत में लिफ्ट के दरवाजे खुल बंद हो रहे थे देखा एक बूढ़ी औरत लिफ्ट के अंदर गई थोड़ी देर बाद द read more >>
पराए जानते है कि मैं किया चाहता हूं, अफसोस तो इस बात का है कि मेरे अपने अनजान है! read more >>
तरस रहे नैना पिया मनवा अकुलाए सावन जस भीगी रतिया फूलन झुलाएँ बिन झपके पलकें राह तके नैना मद भरा बसंत नहीं पतझर बन जाए मीत प्रीत प्य� read more >>
सावन बीता थम गए सेरे गरजे बादल भादो बरसे गौरी गई ससुराल पिया संग डालन से खुल गए झूले | अब सुनी गलियन कौन निहारे बरखा में सब बं read more >>
किसलय सा तन है मेरा सखी आज यह कुंभ लाने क्यों लगा सावन की रिमझिम बरखा में है अंग अंग बल खाने लगा इसको मां की ममता समझूं या समाज ने रचा read more >>
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