पर्वत से नदी निकलती, लेकर नई उमंग।
कैसे, कौन रोकता है, मिल जाऊं सिंधु के संग।
झर- झर, झर- झर झरने बहते, उसको दे देते आधार।
एक-एक से मिल बन जा read more >>
जीवन मे मिले हो तुम मेरे, मै धन धान्य से पूर्ण हुआ।
जीवन मे मिले हो तुम मेरे, मै धन धान्य से पूर्ण हुआ।
पथ मे मेरे अब आलोकित राह का फिर आग� read more >>
कविता-मन की मनमानी
मन की मनमानी
खुद लिख जाती है
अपनी कहानी,
मन से ही जीते हम
मन से ही हारे
मन के आगे न
चलती जुबानी, मन की मनमानी-----
मन च� read more >>