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कविताएँ
सफ़र दोस्ती का !
सफर ए जिंदगानी में कुछ ऐसे दोस्त बन जाते है जो याद रह जाते हैं जो अनजाने में हमारी रूह को पहचान जाते है वो हमे अक्सर में बस ट्रेन में �
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मेरा काम ही सब कुछ है मेरे लिए!
मेरा मन कहता है मैने अपने काम को अपना पेशन समझा है मेंने महल बनाए अपने मन के ओर अपने सपनों में जीता रहा छोड़ दुनिया दारी को में अपने
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पानी का महत्व और जीवन
पानी का महत्व और जीवन बस एक दिन में मुझे तेरी कीमत पता चल गई है कौन है तू में सबकी प्यास बुझाता हुं में सबके काम आता हु कुछ लोग मेरी
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अब तो समझ गया
तो अब समझ गया सुनते हो? ' नहीं ' बतलब बहरे हो ' नहीं ' कुछ कहते हो? ' नहीं ' मतलब गूंगे हो ' नहीं ' तो देखते होंगे? ' नहीं ' मतलब अंधे हो ' नहीं
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Tum thak mt jana
थोड़ा और रुक जा… थक गई हो न? चलते-चलते पाँव जल गए हैं, सपनों के रास्ते धुँधले लगने लगे हैं। पर ज़रा ठहर… क्योंकि सफ़र का ये अँधेरा मंज
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की मुझे पन्नों पे चीखने की आदत सी हो गई है
की मुझे पन्नों पे चीखने की आदत सी हो गई है मेरे दर्द इतने गहरे जो थे, उन्हें स्याही से मोहब्बत हो गई है हर अल्फ़ाज़ में बसते हैं मेरे टू
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दिल और दिमाग
दिल को समझाना और दिमाग को मनाना दोनों कठिन है दिल जो कहता है वो दिमाग मानता नहीं और दिमाग जो मानता है वो दिल समझता नहीं....!! धन्यवा�
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जो चले गए वो अपने थें
जो चले गए वो अपने थें आंखों में कई सपने थें कोई अपनों से मिलकर जाने वाला था तो किसी को अपनों से मिलने की जल्दी थी आंखों में कितनी उमं�
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🇮🇳 "मैं वो लहू हूँ!"
🇮🇳 "मैं वो लहू हूँ!" मैं वो लहू हूँ जो तलवारों में खनकता था, मैं वो नारा हूँ जो बम बनके दहकता था। मैं वो चिंगारी हूँ जो चंद्रशेखर के सीने
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आत्मसमर्पण
आत्मसमर्पण समुद्र न होता तो! मिट जाती - मटकती मचलती थिरकती चंचल नदियों का आस्तित्व, बन जाती - विनाशक घातक तोड़कर किनारों की सीमा
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"तुम अकेले नहीं हो"
तुम अकेले नहीं हो, तुम्हारे साथ है पूरा ब्रह्मांड। जो कर रहे हो, वो करते रहो, अपने दिल की आवाज़ को कभी नजरअंदाज मत करो। जो हो रहा है, हो�
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हम भी इंसान है
क्यों समझते हो हमें सिर्फ़ औज़ार, क्या संविदा का मतलब है लाचार? जिस बिजली से जगमग है ये शहर, उसी रौशनी के पीछे है हमारा ज़हर। हमने जोड�
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