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कविताएँ
भारत देश है मेरा..
जिस देश में गंगा बहती है, संतों का जहाँ निवास, वीरों की धरती वह भारत, है मेरा गर्व, है मेरा विश्वास। जहाँ खेतों में सोना लहराता, मेहनत �
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स्वतंत्रता का अमर गान
"स्वतंत्रता का अमर गान" स्वतंत्रता… कोई क्षणिक उत्सव नहीं… ये रणभूमि की अमर कहानी है… शहीदों के रक्त से सींचे सपनों की… भारतवासियों
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प्रकृति है अनमोल धरोहर
प्रकृति है अनमोल धरोहर है चारों तरफ सुंदर नजारा हुई है प्रकृति का जन्म मानव कल्याण हेतु प्रकृति है अनमोल धरोहर.. प्रकृति वरदान है,प
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खिलौनों से जीवन तक
लेकर निकला था खिलौनें का पहिया, साफ़-सुथरे रास्तों पर। क्या पता था — जीवन का पहिया कीचड़ और दलदल रौंदकर ही आगे बढ़ता है। बचपन में, हर
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"जूतो का शहर"
एक दिन मैं गया जूतों के शहर में, भीड़ थी भारी, हर एक पहर में। कहीं बूट चमचमाते, कहीं चप्पल मुस्काती, कहीं सँडिल की अदाएँ, दिल को लुभाती।
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"जूतो का शहर"
एक दिन मैं गया जूतों के शहर में, भीड़ थी भारी, हर एक पहर में। कहीं बूट चमचमाते, कहीं चप्पल मुस्काती, कहीं सँडिल की अदाएँ, दिल को लुभाती।
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सपनों का बाज़ार
दुनिया खरीदने निकला था सपनों के बाज़ार में, कुछ लम्हे ही ले पाया, बाकी सब महँगा था। चाँद-सितारे बिकते थे हकीकत के सिक्कों पर, मोहब्बत क
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मैं राष्ट्रीय एकता का प्रतीक हूँ
मैं राष्ट्रीय एकता का प्रतीक हूँ मैं तिरंगा कहा जाता हूं 7 अगस्त 1906 को मुझे पारसी बागान में लाया गया हरी पट्टी पर कमल के फूल रखे पील�
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मेरी छत के नीचे अब नहीं भीग सकता
मैं आ गया मेरी छत के नीचे अब नहीं भीग सकता राह में भटक गया था इस तरह जैसे कि में दुबारा खड़ा नहीं हो पाऊंगा आवाज आई पिता का साया है अ�
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विदाई कविता
मैं कल यहां से चला जाऊंगा शायद कभी लौट कर नहीं आऊंगा दुखे नहीं हम किसी को सबके दिलों पर राज किया महक रखी हमने फुलों सी माली बनकर काम �
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भारत मेरी शान
ए भारत मेरे जीता हु तेरी शान में मरता हु तेरी शान में सालों से तुझे गुलामी की जंजीरों झकझोर दिया ओर बाहरी आक्रमणों ने अन्दर से तुझे �
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यू ही घूमने निकल जाता हूं
यू ही में कभी घूमने निकल जाता हू ऊब जाता हू अपने आप से तो घर से निकल जाता हूं सफर करता हूं बस में तो नईं बात संजो लेता हूं ओर देखने जा रह�
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