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सच और झूठ
" सच और झूठ " के दिवार में मैं आज फिर से उलझ गयी, वो दोनों गलत नहीं शायद आज मैं ही गलत बन गयी.. कहते है कि सांप ने कांटा तो सवाल नहीं करते, आज
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प्रेम तुमसे ही हैं
नहीं आता मुझे इश्क़ जताना पर प्रेम तुमसे ही हैं नहीं आता कसमे वादों को निभाना पर जो है जैसा है तुमसे ही है नहीं देख पता जी भर तुम्हे�
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मिटती संस्कृति
गावा री अब सान घटी , शहरा री अब आन बढ़ी। झठे धोती आला डोलता, बठे जिन्सा री अब जेट बढ़ी। मिट्ग्या सारा पीपल गट्टा, मिट्गी गट्टा री सान अ
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प्रतिध्वनि ……
प्रतिध्वनि… मैं पुकारता हूँ तुम्हें , पूरे अंतर्मन की शक्ति लगाकर , पर किसी कठोरता से टकराकर , लौट आती है ध्वनि मेरी , प्रतिध्वनि बनक�
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गौ सेवा
ये हिंदुत्व की पुकार है, गौ हानि देश का संहार है। उठो जन जागो अभी, ये गौ माता की पुकार है। इस देश की महानता, यहां पत्थर पूजे जाते हैं।
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रखना भरोसा खुद पर
रखना भरोसा खुद पर मन को घबराने ना देना कई अटकले आएँगी पर चिन्ता की लकीर दिखने ना देना . बहुत मिलेंगे ऊँगली उठाने वाले तुम होसलो को �
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अमर वीर
बड़ा पढ़ा इतिहास है तुमने, पर ना इस पर विचार किया। ये तुम लोगो की गलती है, तुमने मेरे देश की अखण्डता को मार दिया। मार दिये तुम ने मराठा,
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सीधी टक्कर
सत पथ पर रत, टक्कर जीवन उद्देश्य से। स्व संजात परदा उठे, क्षमता रहस्य से। सलिल में अनल लगा दे, टक्कर चुग़ली तलब से। स्वार्थ चुग्गा च
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मेरा गाँव
( मेरा गाँव ) जहां वृक्ष खड़े हैं,झुककर शुद्ध हवा उनकी स्वाभाव में चाह उनमें इतना देने कि, आदि से अंत सर्वस्व समर्पण। वह �
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नारी शक्ति
जिसके सिर पर जिम्मेदारी है, वह एक नारी है। अपने में संकट आने पर अदम्य रूप धारण करती अत्यंत ज्वलंत भीषण शक्ति से, सब पर भारी है। वह एक न
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शुरुआत
डूबता है, तब भी उसमें आस होती है,प्रभात कि शांत हो यदि कोई तो होता उनमें साहस उत्पात कि अब जरुरत है, फिर से एक नयी शुरुआत कि। थ�
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पलाश
हरियाली संग संवत्सर बिते फागुन मास संन्यास के पतझड़ के बाद जंगल दहक रहा जब खिले फूल पलाश के जब वन-उपवन सुखें हो जल की हो सबमे अमिट प्यास
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