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आज फिर मेरे कंधो पर एक बड़ी जिम्मेदारी है आज फिर मां और ममता को, शब्दों में बाटने की बारी है। सोच रही हूं जिसने अक्षर 2 पढ़ना सिखाया मु read more >>
पुरुष कठोर क्यों पुरुष इतना कठोर भी नही होता , वो सिर्फ बाहर से दिखता है , दिल का बहुत कोमल वो होता है , कठोर होना उसकी मजबूरी है , वो परि� read more >>
काँटों से भरी इस वादी में फूलों का बता दे पता मुझे ए हिन्द की धरती कहाँ है तू। इंसान कहाँ है बता मुझे। कोई हिन्दू कोई मुस्लि read more >>
कविता . -हंसी खो गई है। रचना -जितेन्द्र शर्मा। तिथी -14/01/2023 सब कुछ तो है, बस हंसी खो गई है। पेड़ से उतर हमने अट्टालिका भवन बनाये हैं। सोन read more >>
खिदमत में अर्ज है- ऐ तो खुदा के प्यारे-दरबान थे, मेरे खिदमत में कांटे चुभाते थे! पूरे राह ताकि- रफ्ता-रफ्ता-रास्ता देखता चलूं , अब तेर� read more >>
हंस बोले हिर्दय के अंदर! जिंदगी में सफर एक ही डगर, मंजिल है प्रत्येक के अंदर। मन का नहीं-कहीं कोई नगर, हंस बोले हिर्दय के अंदर।। -मोती read more >>
विश्व की सबसे- बड़ी शक्ति का तू अंश। अपने महानतम- पर हो हृदय से गर्व। तुम्हारा यही- प्रीति और श्रद्धा सुमन। हे मानव- हृदय से कर ईश को अ� read more >>
सबके रहते लगता है ऐसे। कोई नहीं अब तेरे सिवा।। हे मेरे मालिक! कैसे करूं- अब हर फर्ज मैं तेरे सिवा। मेरा हर फर्ज अब तेरे ही चरण।। तुम � read more >>
कहानी- प्रतिशौध या प्रायश्चित।(खण्ड-दो) लेखक- जितेन्द्र शर्मा खण्ड-दो (प्रथम भाग से आगे) युवती जिसने अपने आप को आत्मा बताया था, के जान� read more >>
कहानी- "प्रतिशोध या प्रायश्चित?" खण्ड- एक कहानीकार- जितेन्द्र शर्मा दिनांक- 10/01/2023 निवेदन- सम्मानित पाठकों! यह कहानी कुछ अधिक लम्बी � read more >>
आज की युवा पीढ़ी होने के नाते मैं कुछ खुद के अपने विचार लिख रही हु जैसा की सब को पता है आज आधुनिकता इतनी के जाता बड़ गई है की हमे हमारी जि� read more >>
स्वरचित रचना--- वह तो मजदूर है ....! संदर्भ--- मजदूर जिनकी पेशानी के बल पर इस संसार की संरचना होती है। ऐसे उन असंख्य मजदूरों की पीड़ा में य read more >>
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