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शरद ऋतु
तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में शरद ऋतु का गुणगान करते हुए लिखा है- बरषा बिगत सरद ऋतु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई॥ फूलें कास सकल महि छाई�
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दहेज की आग
दहेज की आग एक रसोई से धुआँ उठा, आग लगी, लपटे बाहर निकली, शोर में कुछ चीखें चिल्लाती, भीड़ में लोगों की कानों आयी, बचाओ-बचाओ, कोई बचाओ, आग
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तुम कैसी मां हो?
कविता -तुम कैसी मां हो? फेंक चलीं क्यों ?दिल रोता है! कूड़े में अब दम घुटता है! अंदर ही अंदर दहता है! कितनी विह्वलता है ! मां की
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अंतर्मन
दूसरों के बारे में तो हम बहुत चाव से और बहुत ही उत्सुकता पूर्वक बातें करते हैं उनकी अच्छाइयां उनकी बुराइयां परंतु कभी-कभी हमें स्वयं क
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जीवन के पन्ने
हमारी जिंदगी भी एक किताब की तरह होती है जिसमें मुझे यह नहीं पता होता है कि अगले पन्ने पर क्या लिखा होगा और हमें क्या ज्ञान प्राप्त होगा
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बेचैन
न जाने क्या देखा मैंने उसकी आंखों में जो आज भी उम्र के इस दौर पर याद करके दिल को बेचैन कर देती है
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दर्द
दिल करता है पीछे मुड़कर देखो उन पुरानी बातों को याद करो पर कभी-कभी ऐसा महसूस होता है कि पीछे मुड़ कर देखने पर दुखते हुए दर्द पर जैसे मैं�
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कुछ कहना है
चलो आज जिंदगी से शिकायत करेंगे कुछ जिंदगी मुझसे कहेगी कुछ मैं भी कहूंगी
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ज्ञान की बाते
मन में बाते आती उतनी सोच रहे हम बैठे कितनी। पूरी हम उनको कर पाए काम की हो जो मेरे जितनी।। ऐसा नहीं है कोई काम जिसका न हो कोई दाम। मोल यह
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मातृदिवस
मातृदिवस था।चारों तरफ युवावर्ग अपनी मां को शुभकामनाएं और उपहार दे रहे थे।कोई अपनी माँ के साथ सेल्फी भी ले रहे थे।बस,चारों तरफ धूम मची
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हिंदी बोलने में शर्म कैसा?
आजकल इंग्लिश बोलने का प्रचलन बहुत ज्यादा ही चल पड़ा है।हर इंसान चाहे वह किसी भी राज्य से हो,मगर इंग्लिश बोलना अपनी शान समझता है। मुझे इ�
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अफसर बेटा
पिता बड़े खुश थे,कारण...?उनका बेटा सरकारी अफसर है।समाज में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ गई है।बड़े-बड़े घरों से रिश्ते आने शुरू हो गए।पिता भी थोड़े बहु
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