भेदों की मूर्खता
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जब बिजली पानी एक है,
धरती भी सबकी एक है,
न चांद सीतारें अलग यहाँ,
सूरज भी कहाँ अनेक है,
न अग्नि करती भेद यहाँ,
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मैं जब भी लिखने बैठती हूं तो यही सोचती हूं कि मैं वही लिखो जो मुझसे और मेरी सोच से जुड़ा हुआ हो जिससे मैं और मुझसे जुड़े लोग भी बहुत ही ज् read more >>
अगर झुकता नहीं चरणों में, यूं ही सर किसी के तो।
तो जाओ दर पे दाता के, झुकाना सीख जाओगे।
अगर मुस्कान लानी है, किसी के‌ चेहरे पे तुमको।
त� read more >>