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Santosh kumar koli ' अकेला'
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Santosh kumar koli ' अकेला'
Santosh kumar koli ' अकेला'
Santosh kumar koli ' अकेला'
@ santosh-kumar-koli
, Rajasthan
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प्रेमी की अभिलाषा
उसके जूड़े का बनूं, यदि मैं बन फूल सकूं। रेशमी जुल्फ़ों की महक से, अपनी महक भूल सकूं। आंसू बनूं उसकी आंखों का, नीली आंखों में घर कर सक
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समय की सोच
यह अनुभवियों का कहना, सबसे भला कभी नहीं रहना। सबसे भले के चक्कर में, खुद का भला जाते भूल। सबसे भले रहने वाले के, पीछे उड़ती राख- धूल।
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वर्षा का नज़ारा
मौसम ने ली अंगड़ाई, देखो वर्षा ऋतु आई। उमड़ घुमड़कर बादल छाए, बोले मोर पपीहा। जानें किसको, किसकी याद सताई, चलने लगी पुरवैया। बूंद �
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झूठ-मूठ का झुनझुना
मैं ये कर देता, वो कर देता, है सफेद झूठ। पीना पड़ेगा कड़वा, पर सच्चा घूंट। अवसर, मौके़, सुविधाओं का, रोना झूठ- मूठ। दीवार को ही पुल बना�
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अछूत बस्ती
दूसरे ग्रह पर आ गए, लगता घुसते ही मोहल्ला। सिंह, शर्मा नहीं, ये हैं नाथ्या, पांच्या, कल्ला। हर रोज़ गाली- गलौज, बरतन फेंकने का हल्ला।
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पूॅंछ के रंग
लंबी, छोटी, पतली, मोटी, कई रूप रंग। ऋजु, वक्र, गोल, पुछल्ला, विभिन्न आकार संग। आन- बान, सम्मान पूॅंछ, पशु का संबंध अंतरंग। सर जाए कट, हस्�
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बरसाती रंग
तुंग श्रृंग पर गिरे, निरंक बादल बगुले से। फाहे से धवल, निखरे- निखरे धुले -धुले से। दुग्ध फेन में, उठते- गिरते बुलबुले से। उबले हुए से
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निराशा क्यों?
दुनिया बेईमानी का खाती है, पर ईमानदारी पूजने वाले भी तो हैं। लोग झूठ के घाट पर नहाते हैं, पर सत्य दरिया में उतरने वाले भी तो हैं। लोग �
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बदलाव
अच्छे-अच्छे वक्ताओं की, हुई बोलती बंद। बजरबट्टू हो रहे, समझते थे अक्लमंद। नज़रों से नज़र चुराकर, हो गए नज़रबंद। तर्क का निकालते अर
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स्पंदित मन
मन ताल जल को, स्थिर करो। चंचल इंद्रियों के तर्ष को, बधिर करो। कंकड़ अकड़ हाज़िरी की, खातिर करो। पानी, पानीय है, मत रुधिर करो। प्रक्�
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