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कविताएँ
कौरव पाया जीत कर-पांडव पर अधिकार हार गए तिय द्रोपदी और हुआ लाचार
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" कौरव पाया जीत कर,पांडव पर अधिकार। हार गए तिय द्रोपदी, और हुआ लाचार।। चीर हरण करने लगा,भरी स
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धीरे धीरे एक दिन- होगा बम विस्फोट बढ़ता यहां अधर्म से अच्छों में भी खोट
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" धीरे धीरे एक दिन,होगा बम विस्फोट। बढ़ता यहां अधर्म से,अच्छों में भी खोट।। धीरे धीरे एक दि�
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अपने मन की बात से-जीतें यह संसार गौरव बन कर देश का सबको दें अधिकार
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" अपने मन की बात से,जीतें यह संसार। गौरव बन कर देश का,सबको दें अधिकार।। अपने मन की बात को,नही�
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एक भरोसा राम का-जो रहते हैं साथ हर विपदा से ले बचा सिर पर रख वो हाथ
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" एक भरोसा राम का,जो रहते हैं साथ। हर विपदा से ले बचा,सिर पर रख वो हाथ।। एक भरोसा राम का,जिससे
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ऐसी कैसी जिन्दगी-रहती है नाराज दूर ज्ञान से यह रहे गलत करे हर काज
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" ऐसी कैसी जिन्दगी,रहती है नाराज। दूर ज्ञान से यह रहे,गलत करे हर काज।। ऐसी कैसी जिन्दगी,रहता
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हँसी और मुस्कान से-करिए नित आदाब पाएं दुआ असीम तब
#विधा:_मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" हँसी और मुस्कान से,करिए नित आदाब। पाएं दुआ असीम तब,रहे शक्ल पर आब। औरों को भी कर सरस,लिए ह�
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हँसी और मुस्कान-रहे जिसका गर साथी
#विधा:_रोला छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" हँसी और मुस्कान,रहे जिसका गर साथी। भय रहता है दूर,मिले सदगुरु की थाथी।। पाएं तब सब ज्ञान,बन�
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आशिक मेरे हैं सभी बनकर अदभुत सोम-हँसी और मुस्कान से खिल जाता है रोम
#विधा:_कुंडलिया छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" आशिक मेरे हैं सभी,बनकर अदभुत सोम। हँसी और मुस्कान से,खिल जाता है रोम।। खिल जाता है रोम,�
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हँसी और मुस्कान से-खिल जाता है रोम
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" हँसी और मुस्कान से,घायल करती नाज। दीवाना मैं जो बना,और लुटा दूं राज।। हँसी और मुस्कान से,ख�
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जिसमें मेरा तेरा कुछ ना हो- बस सब हमारा हो
हां मुझे Single रहना पसन्द है पर इसका मतलब यह नहीं है कि मुझे relationship में problem हैं.. बस आजकल के Temporary रिश्ते से डर लगता हैं... तलाश है किसी ऐसे permanent की �
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नवरात्रि-नौ रुप धारण करके माँ पाप मुक्त किए धरा को
देवी स्वरूपा माँ दूर्गा रूप हैं तेरे पार्वती , गौरी की आती है तू जब धरा पे माँ भीड़ लगने लगती है तेरे द्वारों पे भारी पूजा करने आने -जा�
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क्यों होता है दिल में इतना दर्द मुझको-हमने तो वफा निभाया
क्यों होता है दिल में इतना दर्द मुझको हमने तो वफा निभाया तुमने क्यों दे दी सजा हमी को हर घड़ी ,हर लम्हा बस तेरा ही था इंतज़ार मुझको त�
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