Technology की देन तुम थे
वरना इस भीड़ में, एक दूसरे से परे इस दुनिया में,
शायद ही कभी हम टकराते, हाँ शायद टकराते भी,
पर रुक कर आँखों से आंखें शा� read more >>
तुम्हारे हिस्से की वह हरी,पीली,
लाल, काली,चूड़ियों के वे टुकडे़
आज भी रखे है ...!
तुम्हारे लिए...
जिनके लिए तुम लड़जाया करती थीं,
अपने तेज read more >>
ढलती शाम...शीर्षक
कौतुहल से दूर ढलती संध्या ,
समेटती प्रकृती अपने करतलों को...!
घर जातीं गाय धूल उडा़ती ,
बछडो़ को पाने सुख रभांती ..!
आसम� read more >>
शीर्षक (रोटी)
मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर)
दर दर भटकता इन्सान है रोटी के लिये परेशान है।
कोई घी लगाकर खाता है ,
तो कोई सूखी ही चबाता है� read more >>