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मैंने क्या बिगड़ा था
मैंने क्या बिगड़ा था जो मुझे इस नज़रिए से देखा जाता है मैंने क्या बिगड़ा था क्या ये गलती है मेरी की मै एक गरीब हूं तो क्या मेरी कोई ए
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// ...दे लात... //
छत्तीसगढ़ में तनख्वाह निकालने के एवज में बकरा भात की मांग और अनुकंपा नियुक्ति में रिश्वतखोरी घटना पर मेरी एक छोटी सी सम-सामयिक रचना.....
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बातों ही बातों मे बात कजा हो जाऐगी
बातों ही बातों मे बात कजा हो जाएगी नींद मारी जाएगी रात कजा हो जाएगी ये कैसा धरम है ये कैसे लोग हैं जिनकी अछूतों के छूने से जात कजा हो ज�
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नमन मेरी मातृभाषा
नमन मेरी मातृभाषा नमन उस भाषा को जो हमें संस्कार देती है नमन मेरी हिन्दी को जो भावों को संचार देती है ! बड़ी
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डोर की व्यथा
कोई नहीं सुनता, दुनिया में व्यथा डोर की। सब अपनी- अपनी बेचते, कौन बेचता कमज़ोर की। पतंग परवान चढ़, मेरे बल नाचती। मेरे छोर से और बनती, दु
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नौका पार लगाए कौन
नौका पार लगाए कौन प्रश्न पूछते प्रश्न खड़े हैं उत्तर साधे बैठे मौन । भँवरों के हैं नाविक सारे नौका पार लगाए कौन ? पाँव पसारे विषबे
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बेटियां
बहुत खुश होता है ऊपरवाला तब गोद में आती हैं बेटियां युग कितने भी बदले आज भी लक्ष्मी ही कहलाती हैं बेटियां जिम्मेदारियां पड़े तो रि�
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आज
अब झूठे आरोपों से कोई सीता वनवास नहीं सहेगी भरी सभा में कोई द्रौपदी अब अपमान नहीं सहेगी कोई भी मेरा अब प्रेम में विषपान नहीं करेगी
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एकलव्य
धनुष था मेरे बाणों का दर्पण चमत्कारी वैभव भुजाओं में निषाद पुत्र का अंश सवेरा चला था स्वर्ण बहारों में नादान अनजान बालक था मै वह�
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अरमाँ
बिखरे बिखरे पड़े हैं मेरी आँखों में मेरे अधूरे से अरमाँ। और ये पङे पङे मेरी आखों में ही नित रोते हैं। और जब ये बिखरते है जमी पर तो मै भी
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जिन्दगी एक सफर है सुहाना
मौत का खौफ ना कर, बिना रुके सफर कर। कभी भी दुनिया की प्रवाह ना कर, बस अपने सपनों को सकार कर। यहां आए हो किसलिए? खूब_खाकर और पचाकर, जाना नह
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अगर हाथों में आई तेरी नाकामी
अगर हाथों में आई तेरी नाकामी तो यह मत समझ तू काबिल नहीं, ये तेरे सब्र की इम्तहान है समझ मंजिल पाना है तुझे प्रयत्न की सीढ़ियां चढ़ते जा
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