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रोजी रोटी के लिए-परेशान हैं लोग
(दोहा छंद) रोजी रोटी के लिए, परेशान हैं लोग। कुछ जन को तो बहुत है,कुछ को कुछ मत भोग।। रोजी रोटी के लिए, करना पड़ता काम। करा मेहनत से मिले
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मन में भरूं प्रकाश-पावन भव्य विचार से बन जाऊँ आकाश
#विधा:-मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" दीवाली की दूज पर,मन में भरूं प्रकाश। पावन भव्य विचार से,बन जाऊँ आकाश। जिसमें खाली गुण र�
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दीवाली की दूज पर-बहना दे आशीष
#विधा:-दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" दीवाली की दूज पर,बहना दे आशीष। भाई को करती तिलक,भाई बने मनीष।। दीवाली की दूज पर,दिखे खास �
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होगा भला समाज का-रखें एकता प्रीत
#विधा:-मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" होगा भला समाज का,रखें एकता प्रीत। दूर भगाओ अब नशा,अपनाओ मृदु रीत। मानववाद विशेष है,उत्त�
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झूठ और पाखंड को-कर देंगे हम खत्म
#विद्या:-मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" झूठ और पाखंड को,कर देंगे हम खत्म। सत्य धर्म से ही यहां,मिले अटल एकात्म। जगमग इस संसार
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ऐसी करनी कीजिए-सभी बुराई दे उड़ा मन में भरे उफान
#विद्या:-मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" ऐसी करनी कीजिये,बने दिव्य तूफान। सभी बुराई दे उड़ा,मन में भरे उफान। नशा मुक्त संसार ह
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माया जोड़ी रात दिन-लिया बहुत ही दर्द
#विधा:- मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" माया जोड़ी रात दिन,लिया बहुत ही दर्द। सबल किया परिवार को,बना रहा दृढ़ मर्द। हँसकर आगे को
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अपने को जो मानते-लगते हैं दिलदार
#विधा:-मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" अपने को जो मानते,लगते हैं दिलदार। ऐसा दिल अब है लगा,करता दृढ़ किरदार। ऐसे दृढ़ किरदा�
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जलता दीपक आस का-हृदय चाहता खास
#विधा:_मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" जलता दीपक आस का,हृदय चाहता खास। लब से निकले प्रेम ही,मिटे सभी की प्यास। सफल भव्य किरदार स
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पत्थर-बुजदिल बन के जीने से अच्छा है किसी रास्ते का पत्थर बन के जीओ
बादशाहों,या दूसरों के रहमों कर्म पर, या बुजदिल बन के जीने से अच्छा है। किसी रास्ते का पत्थर बन के जीओ । जब भी,किसी को ढोंकर लगेगी। दुआ�
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सावधान हो जाओ-आज की दुनियाँ में धोखे बाज कम नहीं बाहर से दिखे मासूम अंदर वह विष रखे
आज की दुनियाँ में धोखे बाज कम नहीं, बाहर से दिखे मासूम अंदर वह विष रखे। बातें प्यारी-प्यारी करें और कर लेता वश में, फिर कर देता है अपन�
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खावाईश-दर-दर भटक रहे है खावाईशो कि आंघीयाँ ले उडी़
ये, खावाईशो कि आंघीयाँ ले उडी़ बादशाहों की नींद, और परिन्दों के घर........ दर-दर भटक रहै है। आज भी मुहोबतों के वाशिन्दे , के, ऊमीद, मे उजड़ ग�
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