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तेरी क्या औकात है सरा हुआ है अक्ल-अब तक भी पीछे रहे करते खाली नक्ल
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" तेरी क्या औकात है,सरा हुआ है अक्ल। अब तक भी पीछे रहे,करते खाली नक्ल।। तेरी क्या औकात है,आए �
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जीना है तो सीख ले जीने के सब ढंग-अनुभव की जब दीप हो रहे प्रगति तब संग
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" जीना है तो सीख ले,जीने के सब ढंग। अनुभव की जब दीप हो,रहे प्रगति तब संग।। जीना है तो सीख ले,जी
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नारी तेरा संग हो फिर तो है आनंद-सुख दुख को हम बांट कर पिएं नित्य मकरंद
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" नारी तेरा संग हो,फिर तो है आनंद। सुख दुख को हम बांट कर, पिएं नित्य मकरंद।। नारी तेरा संग हो,�
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गरीबी ने मारा-गरीबी ने सारे अरमानों को जला कर राख कर दिया जिंदगी की सारी कलियाँ ही मुरझा गई
गरीबी ने सारे अरमानों को जला कर राख कर दिया, अपनों के भीड़ से सरेआम बाहर कर दिया। अपने ही समाज ने जिल्लत भरी जिंदगी है दी, जिंदगी की सा�
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अंतिम दिन बनवास का होगा रावण अंत-खुशियाँ भारत वर्ष में करते जय जय संत
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" अंतिम दिन वनवास का,होगा रावण अंत। खुशियाँ भारत वर्ष में,करते जय_जय संत।। अंतिम दिन वनवास �
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मन में धीरज राखिए तभी मिलेंगे नूर-श्याना बनकर हम यहां लेते रहें सरूर
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" मन में धीरज राखिए,तभी मिलेंगे नूर। श्याना बनकर हम यहां,लेते रहें सरूर।। मन में धीरज राखिए,
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होगा भला समज का जब खुद में हो शक्ति-कुछ ऐसा ही काम कर मिले न कहीं विरक्ति
#विधा:- दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" होगा भला समाज का,जब खुद में हो शक्ति। कुछ ऐसा ही काम कर,मिले न कहीं विरक्ति।। होगा भला समा�
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आकस्मिकता-थोड़ी ही देर में बना बनाया काम बिगड़ जाता है
थोड़ी ही देर में, बना -बनाया काम, बिगड़ जाता है। सबसे आगे वाला, पिछड़ जाता है। थोड़ी ही देर में, जीतने वाला, जाता है हार। हारने वाले की, �
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कुछ समय पहले तक ऐसी उदासी न थी-चारों ओर ऐसा सन्नाटा ना था
कुछ समय पहले तक ऐसी उदासी न थी चारों ओर ऐसा सन्नाटा ना था मुर्गे की आवाज से पक्षियों की चहचहाट से होती थी सुबह शुरुआत न जाने कहां से द�
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परिवार-परिवार में रहना ही सबसे अच्छी बात है
बात उन दिनों की है जब हमारी शादी एक संयुक्त परिवार में तय हुई। मुझे पहले से ही पता था कि मेरे पति अपने माता-पिता अपनी दो बहन दो भाइयों के
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मेरी पहली कमाई-घर के देख हालातों को खुद से ही मैं रूठ गया हूँ
घर के देख हालातों को खुद से ही मैं रूठ गया हूँ ज़िम्मेदारीयों का बोझ लिए आज कमाने निकल गया हूँ। पसीने से कपड़े हैं लतपत हाथों पर मेह
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रुप बदले अंदाज बदले दया धर्म करने वाले के भी लिहाज बदले
रुप बदले अंदाज बदले दया धर्म करने वालों के लिहाज बदले बदल गया यह पूरा जमाना मुसीबत आई जब एक अबला पे सबके राज बदले मानवता शर्मसार हुआ
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