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संदीप कुमार सिंह
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संदीप कुमार सिंह
संदीप कुमार सिंह
संदीप कुमार सिंह
@ sandeep-kumar-singh
, Bihar
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me.
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बैसाखी पर
बैसाखी पर चलने वाले मद में झूम रहे हैं। स्वारथ के ताने बाने बुन हर पग चूम रहे हैं। नेपथ्यों से लक्ष्य साधते कंधे बदल बदल कर-- संबंधों क�
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नजर को
नज़र को नज़र की नज़र न लगे। कोई अच्छा भी इस कदर न लगे। तुझे देखा है उस नज़र से मैंने-- जिस नज़र से तुझे नज़र न लगे।। (स्वरचित म�
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टूटा हुआ सितारा
मैं एक टूटा हुआ सितारा हूँ। सागर की मौजों का किनारा हूँ। फिर भी करती दुनियाँ मुझे पसंद, दर्द के मारों का एक सहारा हूँ। कास मेरे
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हवा ने आज
हवा ने आज दिल खोल कर धूम मचाई है। फिज़ा में फूलों की खुशबू आज खूब उड़ाई है। जीव सारे हर्ष विभोर हो कर मस्ती करने लगे। प्रेमी जोड़े �
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ज़िन्दा दिल रहना
शौक़ पुरा करना ज़िन्दा दिल रहना य़ार मेरे, वक्त की चाल को दृढ जवाब देना य़ार मेरे। हौसला तो है पर वफादार लोग नहीं मिलते, अपने दम पर कर गु�
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तेरा रुख़सार
एक नज़र देखा तुम्हें और मुहब्बत हो गई, धड़कन बन के तुम मेरी ज़रुरत हो गई। साड़ी पहन कर जब तुम निकलती हो जानू, सड़क तुम्हारी खुशबू से खू
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आशिक बेमिसाल
आशिक बेमिसाल तुम्हारे चेहरे पर के मुस्कान का कौन शानी है, मेरी गज़ल से तो अच्छी तेरी जवानी है। तेरे हस्न के सागर में कितने आशिक �
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बेच दिया ईमान
उसका कोई रूप नहीं है, बेच दिया ईमान । खाना पीना मस्ती करना,खोले व्यर्थ जुबान । काबू मन पर रहा नहीं है,रहा नहीं है फर्ज- जैसे बिन पे
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साहस का फूल
साहस का फूल जब खिलता है तो पत्थर में भी फूल खिलते। ढूँढ़ों तो मतलबी ज़माने में भी जीने के उसूल मिलते । सीखना समझना जरुरी है अनु�
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मस्त रहें
मित्रों मस्त रहें _ व्यस्त रहें _ स्वस्थ्य रहें । बरसात के इस मौसम में जरा खास ध्यान रखने की जरूरत होगी। समय के साथ जो तालमेल मिला
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